कविराज विजय यशवंत सातपुते

 

(समाज , संस्कृति, साहित्य में  ही नहीं अपितु सोशल मीडिया में गहरी पैठ रखने वाले  कविराज विजय यशवंत सातपुते जी  की  सोशल मीडिया  की  टेगलाइन माणूस वाचतो मी……!!!!” ही काफी है उनके बारे में जानने के लिए। जो साहित्यकार मनुष्य को पढ़ सकता है वह कुछ भी और किसी को भी पढ़ सकने की क्षमता रखता है।आप कई साहित्यिक,  सांस्कृतिक  एवं सामाजिक संस्थाओं से जुड़े हुए हैं ।  इस साप्ताहिक स्तम्भ के माध्यम से वे किसी न किसी सामाजिक  व्यवस्था के बारे में चर्चा करते हैं एवं हमें उसके निदान के लिए भी प्रेरित करते हैं।  आज प्रस्तुत है श्री विजय जी की एक  भावप्रवण कविता  “पिंपळपान”।  आप प्रत्येक शुक्रवार को उनके मानवीय संवेदना के सकारात्मक साहित्य को पढ़ सकेंगे।  )

☆ समाजपारावरून साप्ताहिक स्तम्भ ☆ पुष्प चौवीस # 24 ☆

☆ पिंपळपान ☆

 

वयानुसार सारच बदलत

बदलत नाहीत आठवणी

पिंपळपान जपलेले

बालपणीची करते उजळणी.

कितीही झाल जीर्ण तरीही

जाळीमधून उलगडते

क्षण क्षण जपलेले

सांभाळताना  गडबडते.

पुस्तकात जपलेले

पिंपळपान दिसले की

आठवणींना फुटतो पाझर

असे होतो तसे होतो

भावनांचा सुरू जागर.

जपून ठेवलेले पिंपळपान

कुणी म्हणते  लक्ष्मी वसे

कुणी म्हणते आहे खवीस

वाईट शक्ती तिथे वसे.

हिरवेगार पिंपळपान

आकार त्याचा ह्रदयाकार

सतत वाटते जवळचे

स्पर्श त्याचा शब्द सार. . . !

हिरवे असो वा पिवळे

घेते लक्ष वेधून

पिंपळपान  आयुष्याचे

मनामनात बसे लपून

मनामनात बसे लपून

 

© विजय यशवंत सातपुते

यशश्री, 100 ब दीपलक्ष्मी सोसायटी,  सहकार नगर नंबर दोन, पुणे 411 009.

मोबाईल  9371319798.

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