सुश्री इन्दिरा किसलय
☆ पुस्तक चर्चा ☆ मिठलबरा की आत्मकथा – लेखक – गिरीश पंकज ☆ सुश्री इन्दिरा किसलय ☆
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मिठलबरा की आत्मकथा
यशस्वी साहित्यकार पत्रकार गिरीश पंकज कृत वह उपन्यास जो पत्रकारिता की भीतरी दुनिया की पड़ताल करता है। वैचारिकी को उष्मा प्रदान करने वाली जबर्दस्त प्रस्तुति जो सहज हास्य में छिपे तीक्ष्ण व्यंग्य के साथ मन पर अमिट छाप छोड़ जाएगी।
☆ विहंगम दृष्टिपात “मिठलबरा” पर – इन्दिरा किसलय ☆
“समकालीन हिन्दी पत्रकारिता का रेशा रेशा उधेड़ता हुआ सच का बेखौफ दस्तावेज है—मिठलबरा की आत्मकथा। जहाँ कटघरे में व्यक्ति नहीं प्रवृत्ति है।
मिशन को कमीशन में तब्दील करते संपादक, पिन/पीत पत्रकारिता से लिपटे हुए पत्रकार, विज्ञप्तिजीवी नेता, चमचे, दिलजले, छपासपीड़ित, यूनियनबाज, शोषित-मातहत और छद्म बुद्धिजीवियों को बेनकाब करते हुए पंकज, पाठकों की धड़कन में समा जाते हैं।
धनबल और मिठलबरों की फौज के बीच मासूम सच बलि के बकरे सा लगता है।
उपभोक्तावादी पंक में आपादमस्तक डूबी महानगरीय पत्रकारिता का आतंक नैतिक चेतना को छटपटाने तक की इज़ाजत नहीं देता। चेहरा पाने की तलाश में बेचेहरा होते लोग पंकज के निशाने पर हैं। क्रान्तदर्शी उपन्यासकार की भूमिका में उन्होंने मुद्दतों से बेचैन वक्त को राहत प्रदान की है।
मिठलबरा-छत्तीसगढ़ी भाषा का शब्द है। यानी वो शख्स जो आदतन झूठ बोले और झूठ को चाशनी में डुबाकर बोले। सामने तो मुस्कुराए और आदमी के घूमते ही पीठ में छुरा घोंप दे।
प्रसंगवश सामिष गालियांऔर व्यावहारिक हिन्दी का आंचलिक रूप कथ्य को जीभ पर हरी मिर्च सा रख जाता है। पाठक पानी भी नहीं मांगता। आनुषंगिक प्रस्तुतियों की एक धारा कभी “जूली” तो कभी चाटुकार चुगलखोरों की रसीली बोली के माध्यम से बेसाख्ता गुदगुदाती हुई नग्न सत्य के कालकूट विष को पचाने की सामर्थ्य देती है। झोंक, खांटी, गरियाना, चुम्मू, भदभदाकर हँसना जैसे शब्द अँचल का रंग उड़ेलते हैं पाठकों पर।
काश “पंकज” उपन्यास को महज फंतासी न कहते। यह उपन्यास नहीं चलचित्र है। अखबारों की दुनिया में व्याप्त भ्रष्टाचार पर उनकी तड़प सतत अग्निवर्षा में तब्दील हो गई है। स्वातंत्र्योत्तर पत्रकारिता के परिप्रेक्ष्य में उन्होंने उन काँच की दीवारों को कलम के हीरे से काटा है जो चीखों को उस पार जाने नहीं देतीं।
उपन्यास की परंपरा में बहुत संभव है श्रीलाल शुक्ल की “राग दरबारी”और हरिशंकर परसाई की “रानी नागफनी की कहानी स्मरण हो आए। पर मिठलबरा की आत्मकथा अनोखी तथा अपूर्व है। क्योंकि इसमें उपन्यासकार ने सच्चाई से द्रविड़ प्राणायाम नहीं करवाया है। ऐसे में उनका साहस ऐतिहासिक हो गया है। तथा स्तुत्य है इस मायने में कि उनके व्यक्तित्व और ईमानदारी के बीच किसी किस्म की पर्दादारी नहीं है।।
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© सुश्री इंदिरा किसलय
≈संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





