श्री प्रतुल श्रीवास्तव
वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।
प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन
आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य “युद्ध और युद्ध विराम से खुशी और गम”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २३ ☆
☆ व्यंग्य ☆ “युद्ध और युद्ध विराम से खुशी और गम” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव ☆
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“गेहूँ के साथ घुन पिसता है” आपने अक्सर सुना होगा। इजरायल, ईरान और अमेरिका के बीच जारी घमासान युद्ध में विश्व भर में यह कथन सार्थक हुआ। नष्ट हुए तेल ठिकानों, अवरुद्ध आपूर्ति मार्गों ने न सिर्फ तेल और गैस के दाम विश्व भर के देशों में बढ़ा दिए हैं वरन चिंताजनक कमी पैदा कर दी। यद्यपि फिलहाल युद्ध विराम हो गया है पर युद्ध के बादल अभी छंटे नहीं हैं। युद्ध में बुरे फंसे ट्रंप को अपमानित कराकर आखिर “कम्बल ने उन्हें छोड़ दिया” फिर भी अगले पल वे क्या करेंगे, उन्हें खुद भी नहीं पता, कह नहीं सकते कि कब वे फिर से “कम्बल पकड़ लें”। युद्ध के परिणाम कहीं साइकिल और चूल्हा युग के दर्शनों से वंचित, पैदल चलने से परहेज करने वाली नई पीढ़ी को इसका अनुभव न करा दें। आरोप – प्रत्यारोप के साथ – साथ “तू तू – मैं मैं” की पक्ष – विपक्ष की राजनीतिक बयानबाजियों, हुल्लड़, प्रदर्शनों से तो सभी परिचित हैं। विपक्ष तो सदा ही सरकार को कमजोर, अदूरदर्शी, नाकाम साबित करने के लिए मुद्दों और अवसरों की तलाश में लगा रहता है। यद्यपि हमारे देश की सरकार काफी समय से चीख – चीख कर कह रही थी कि अभी हमारे सामने पेट्रोल, डीजल का संकट नहीं है और अब तो युद्ध विराम भी हो गया है, गैस की थोड़ी समस्या है किंतु इसके समाधान के प्रयत्न भी जारी हैं। पर जो सरकार की बात सुन और समझ कर जनता को भी समझाए क्या आप उसे विपक्ष कहेंगे ? विपक्ष सरकार को नकारा साबित करने निरंतर अपने कदम कठोर करता जा रहा है, सरकार ने इस समस्या से निपटने पहले कदम, फिर कठोर कदम और अति कठोर कदम उठाना शुरू कर दिए हैं।
गैस सिलेंडर प्राप्त करने के लिए गृहणियां अपने – अपने पतियों – पुत्रों से गैस एजेंसियों की ओर कदम उठाने और वहां पहुंचकर जब तक गैस न मिले अंगद की तरह पैर जमाए रखने की हिदायत दे रही हैं। लोगों का सूर्योदय – सूर्यास्त गैस एजेंसियों के समक्ष लगी लाइन में हो रहा है। कुछ अच्छी पत्नियां तो गैस की लाइन में लगे अपने पति को टिफिन पहुंचाते हुए भी देखी गईं। सरकार तेल और गैस के लिए लगी लाइनें देख कर चिंतित होती रही है और विपक्ष खुशियां मनाता रहा, विपक्ष चाह रहा था कि लाइन बढ़ती जाएं, लोगों में टकराव शुरू हो। डीजल – पेट्रोल पंपों में भी उपभोक्ताओं को जरूरत से ज्यादा तेल लेने प्रयासरत देखा गया। जो इसमें सफल हो जाता उसकी खुशी देखते ही बनती। विपक्ष गैस, डीजल – पेट्रोल की किल्लत का ठीकरा सरकार पर फोड़ रहा है। उसका कहना है कि सरकार के मुखिया ट्रंप के चमचे हैं वे ईंधन की आपूर्ति के लिए प्रयास करने की जगह घुइयां छील रहे हैं।
टीवी चैनलों में डिवेट जारी है। सरकार और विपक्ष के प्रतिनिधि एक दूसरे का चीर हरण कर रहे हैं। सरकार का कहना है कि वह परिस्थितियों से निपट रही है, उसके पास 2 माह का पर्याप्त स्टॉक है और कच्चे तेल के जहाज आ रहे हैं। विपक्ष इसे सरकार का झूठ बताता रहा। उसका कहना है कि ऐसा है तो गैस, पेट्रोल के लिए लंबी कतारें क्यों लगी ? इसके विपरीत सरकार का कहना है कि पेट्रोल, डीजल, गैस की कमी की अफवाह फैलाकर लोगों की लाइन लगवाने का काम विपक्ष ने किया। जनता उलझन में है कि किसकी बात को सही माने ! कुछ लोगों का कहना है कि सरकार 5 राज्यों के होने वाले चुनावों तक रुकी है फिर देश में तेल और गैस की मारा मारी भी होगी और दाम भी बढ़ेंगे। सरकार तो सरकार है क्या नहीं कर सकती। कुछ लोग कह रहे हैं कि यदि हम थाली, घंटा बजाकर, दिया और टॉर्च जलाकर कोरोना को भगा सकते हैं तो हमें अमेरिका, इजरायल, ईरान का युद्ध परमानेंट रुकवाने के लिए भी इसी तरह के कुछ प्रयोग करना चाहिए। आश्चर्य है, जिन लोगों को दीवाली के पटाखों से प्रदूषण का खतरा नजर आता था, पृथ्वी की ओज़ोन परत फटती नजर आती थी, जो पटाखों की मनाही के लिए देश – विदेश में हाहाकार मचाने लगते थे वे सब ईरान, इजरायल, अमेरिका के आतिशी युद्ध पर मौन रहे। एक बात और बता दूं मेरे पड़ोसी वर्मा जी जब – तब मेरे पास आकर मुझसे युद्ध रुकवाने का आग्रह करते रहे, कहते थे आप पत्रकार हैं, सक्षम हैं, आपको इस सिलसिले में मोदी जी से बात करना चाहिए। अच्छा हुआ युद्ध विराम हो गया, ट्रंप कम्बल से छूटे, हमारी सरकार को राहत मिली, विपक्ष नए मुद्दे की तलाश में लग गया और वर्मा जी ने भी मेरा पीछा छोड़ा।
© श्री प्रतुल श्रीवास्तव
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