श्री प्रदीप शर्मा
(वरिष्ठ साहित्यकार श्री प्रदीप शर्मा जी द्वारा हमारे प्रबुद्ध पाठकों के लिए दैनिक स्तम्भ “अभी अभी” के लिए आभार।आप प्रतिदिन इस स्तम्भ के अंतर्गत श्री प्रदीप शर्मा जी के चर्चित आलेख पढ़ सकेंगे। आज प्रस्तुत है आपका आलेख – “एम.फिल् की महफिल …“।)
अभी अभी # १०८७ ⇒ आलेख – एम.फिल् की महफिल
श्री प्रदीप शर्मा
एम फिल् की महफिल सजी है, चले आइए, आपकी बस कमी है, चले आइए! M.Phil. कोई बीमारी नहीं, मास्टर ऑफ फिलोसॉफी की डिग्री है, जिसे अब यूजीसी ने अमान्य कर दिया है। जो एम फिल हो गए, सो हो गए, खेल खतम, पैसा हजम।
डिग्रियों का खेल है ये, डिग्री पर डिग्री लिए जा रहे हो। खुद डॉक्टर होकर, अपनी नब्ज़ नहीं पहचान पा रहे हो। जी हां, एक ढूंढो हजार मिलेंगे, कोई डी लिट्, तो कोई पीएचडी, कोई एमबीबीएस तो कोई एमडी और एमएस! बेचारे दांत वाले की डिग्री अलग है, बीडीएस, मानो कोई बीएएमएस चला आ रहा हो। हमारे जमाने में तो एलएमपी भी डॉक्टर होते थे, यानी लोकल मेडिकल प्रैक्टिशनर। मेरा एक मित्र तो आज भी अपने आपको गर्व से L.M.P. ही कहता था, लोकल मिडिल पास।।
हमारे लिए केबीसी, केवाईसी और यूजीसी में कोई अंतर नहीं। हमें जीवन में ना तो कभी कोई ग्रांट अथवा स्कॉलरशिप मिली और ना ही कोई कमीशन। जब से उच्च शिक्षा में पदोन्नति के लिए पीएचडी अनिवार्य हो गया, सभी बड़े, बूढ़े पीएचडी की दौड़ में शामिल हो गए। पढ़ना और पढ़ाना सबके बस का नहीं होता। या तो हमसे पढ़वा लो, या फिर हमको पढ़ने दो। एक वेतन में दो दो दायित्व क्या तन और मन का शोषण नहीं।
हमें थीसिस, शोध, शोध प्रबंध, डिजर्टेशन अथवा पीएचडी की एबीसी भी नहीं आती क्योंकि हम कोई डिग्रीधारी बुद्धिजीवी भी नहीं। शिक्षा और चिकित्सा के अलावा साहित्य में भी डॉक्टरों का बड़ा सम्मान है। पहले साहित्य रत्न और विशारद से ही काम चल जाता था, लेकिन डॉक्टरेट की एक अलग ही गरिमा है। अब तो साहित्य में आपको टू इन वन डॉक्टर भी मिलेंगे। यानी डिग्री चिकित्सा की और फितरत से साहित्यकार और व्यंग्यकार। ऐसी विलक्षण प्रतिभाओं के आगे तो चार वेदों का ज्ञान भी फीका पड़ जाता है।।
डी लिट मतलब डॉक्टर ऑफ़ लिटरेचर, पीएचडी यानी डॉक्टर ऑफ फिलोसॉफी यहां तक तो आसानी से हजम हो जाता है लेकिन एमफिल यानी मास्टर ऑफ फिलोसॉफी कभी हमारे गले नहीं उतरी। वैसे ऐसी कई विवादित डिग्रियां हैं, जिन पर जनहित और देशहित में चुप रहना ही बेहतर है।
एक आयोजन प्रेमी हाल ही में एक संगीत के प्रोग्राम में जबरदस्ती टकरा गए, परिचय की लपेट में उन्होंने अपने आपको कवि, साहित्यकार, अभिनेता और एंकर के साथ एमफिल भी बता दिया। तब शायद पहली बार यह एमफिल की डिग्री हमारी नजरों से गिरी क्योंकि वे तो बहुत पहले से ही गिर चुके थे।।
जो शिक्षाशास्त्री हैं, शिक्षाविद् हैं वे ही इस मामले कुछ कहने का हक रखते हैं, हम तो मुंह नहीं चला पाए, इसलिए यूं ही कलम चला दी। दुख तो होता है, जब कोई विदा होता है। एमफिल की महफिल को हम दुखी मन से अलविदा कहते हैं ;
हम छोड़ चले हैं एमफिल को ;याद आए कभी तो मत रोना ..!!!
© श्री प्रदीप शर्मा
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