श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – आपका ही घर है…।)

☆ लघुकथा # 78 – आपका ही घर है… श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

अवनीश जी ने चिल्लाकर गुस्से में कहा – क्या हुआ भाग्यवान अभी तक तुमने चाय नहीं बनाई?

क्या करूं घर के काम ही नहीं खत्म होते बना रही हूं, कमल जी ने धीमे में कहा।

चाय पी लो आज नाश्ता नहीं बनेगा सीधे मैं खाना ही बना रही हूं क्योंकि आपने अपनी बहन को बुला लिया है और उनके साथ बुआ जी भी आ रही हैं। अभी-अभी तो हमने बेटी श्रुति की शादी की है, अब बेटी दामाद को कब बुलाऊ कुछ समझ नहीं आ रहा है।

बेटी दामाद को भी बुला लो क्या मेरी बहन उनका खाना या कुछ छीन लेंगे या तुमसे कुछ लेती हैं।

कमल जी ने कहा- मुझसे तो कोई कुछ नहीं लेता, आप तो दुकान चले जाते हो सारा दिन सबके आराम का ख्याल तो मुझे ही रखना पड़ता है, राखी आ रही है, इस त्यौहार में मैं अपने भाई के यहां मायके तो नहीं जा पाती। ऊपर से दिनभर सब बैठकर ताने सुनाती रहेंगी।

अवनीश जी ने कहा -तुम बोलो तो उन्हें फोन करके मना कर दूं।

कमल जी ने कहा- नहीं नहीं, सभी को बुला लो और कोई बचा हो तो।

तुम चिंता मत करो झाड़ू पोछा बर्तन के साथ खाना बनाने के लिए भी बाई को रख लेंगे।या तुम कहो तो दिन भर एक काम वाले लड़के को दुकान से भेज देता हूं। बुआ जी तो बुजुर्ग है दीदी भी तुम्हारे काम में मदद कर देगी। मैंने दामाद जी और परख बिटिया को भी बुला लिया है।

इतने में दोनों दरवाजे पर देखते हैं तो बुआ और उसकी बहन रागिनी दोनों खड़े हुए सारी बातें सुनते हैं।

आप लोग बिटिया और दामाद को बुला लो और हमारी चिंता मत करो अब से हम राखी के दिन ही आकर राखी बांधकर चले जाया करेंगे क्या करें। इसी बहाने हम सभी को मायके आने का मौका मिलता है नहीं तो कोई आने नहीं देता कुछ दिन आराम से रहकर बचपन के दिन जीते हैं।

कमल जी की आंखें नम हो जाती है और आंसू निकलने लगते हैं, वे कहती है- आप लोग मुझे माफ कर दीजिए, आइये बैठिए आपका ही घर है दीदी।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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Awdhesh Narayan Khare
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बहुत अच्छी लघु कथा