श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – उपहार।)

☆ लघुकथा # ८० – उपहार श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

“आज पार्टी में जाना है। मैं तो तैयार हूं, तुम भी तैयार हो जाओ। बाहर से लाने को कहा था क्या कुछ लाये हो?”

“हाँ रागिनी में लेकर आया हूं यह पांच सुंदर फूलों के पौधे हैं, इनमें से जो चाहे तुम घर में रख लो और एक दो पौधे उपहार में दे देते हैं।”

“सुंदर पौधे लाये हो ना ..?  या जैसे सब्जी वाले से दया खाकर सब्जियां ले लेते हो, या कुछ भी?” गुस्सा होते हुए जोर से रागिनी ने कहा।

“उपहार में तो फूलों का गुलदस्ता  ही अच्छा लगता है।”

“कोई बात नहीं मेरे पास एक सुंदर सा पर्स रखा है उसको पैक करके और  गुलाब, मोगरा, गेंदा गुड़हल और रजनीगंधा फूलों के पौधे  दे  देती हूँ, इन्हें कौन रखेगा फालतू की झंझट अपनी अलग डालो?”

“क्यों .. ऐसे क्यों कह रही हो ?”

“पूजा के लिए फूल तो तुम्हें मिलेंगे साथ ही साथ बाल में भी लगा सकती हो” अरुण ने मुस्कुराते हुए कहा।

“गुलदस्ते तो सूख जाते हैं तो हम इधर-उधर फेंक देते हैं फूल तो हमारे सच्चे साथी हैं। फूलों की खुशबू के साथ बालकनी में बैठकर चाय पियेंगे और  भीनी- भीनी महक पूरे घर में रहेगी।”

“अरे लेकिन तुम्हारी बहन तो मुझे चार बातें सबके सामने सुना कर बेज्जती करेगी।”

“ठीक है मैं तैयार होने जाता हूँ तुम्हारी जो समझ में आए वह करो।”

“जब दोनों उपहार लेकर गए तो फूल देखकर उनकी बहन बहुत खुश हुई। बोली – “बहुत ही सुंदर उपहार लाई हो भाभी।”

सारे लोग देखकर खुश हो गए और जोर से ताली भी बजाने लगे।  आपस में सभी ने यही प्रण किया, कि हम एक दूसरे को माला और गुलदस्ते के बजाय एक पौधा गिफ्ट किया करेंगे।

रागिनी ने कहा- “हां मैंने इसीलिए तुम्हारे भैया से  मंगवाई यह उपहार हम आपके लिए लाये हैं।”

अरुण मुस्कुराते हुए अपनी बहन को देखा और बोला चलो केक काटते हैं।

पौधों का उपहार देना हमारे जीवन के लिए बहुत अच्छा है मन भी खुश रहता है और घर की भी सौंदर्यता बढ़ती है।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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