श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – जीवन का रंग।)

☆ लघुकथा # ९१ – जीवन का रंग श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

“अरे अरे पगली जब अक्ल बंट रही थी तो कहाँ थी तू, बेवकूफी की हद है, तुम्हें अलमारी में ना ठीक से कपड़े रखने आता है और ना ऑफिस जाते समय मेरे खाने का ठीक से टिफिन रखना आता है। कोई नई डिश बना भी नहीं सकती, रोज-रोज वही रोटी सब्जी ही बस बना कर दे देती हो? मेरे ऑफिस का चपरासी तक अच्छे से टिफिन लेकर आता है। जाने क्या तुम एम ए (इकोनॉमिक्स) से हो और घर का हिसाब किताब तक ठीक से संभाल नहीं  सकती।”

सुबह-सुबह जयंती को मनोज बड़बड़ा रहा था।

जयंती ने गंभीर स्वर में कहा – “मनोज तुम्हें मुझसे इतनी ही दिक्कत है तो मुझे छोड़ कर चले क्यों नहीं जाते। अपने परिवार वालों और दोस्तों के सामने हमेशा मेरी बेइज्जती करते रहते हो और यह क्यों भूल जाते हो कि मेरे पिताजी के दिए हुए फ्लैट में ही रह रहे हो तब शादी क्यों कर ली थी?”

मनोज ने गुस्से में कहा- “अच्छा सुबह- सुबह लड़ाई झगड़ा बंद करो? बस अब आंसू बहाने लगोगी, बस रो रोकर जीती हो। चलो अब जल्दी से नाश्ता लगा दो? ”

तभी फोन की घंटी बजती है।

अब देखो किसका फोन है जयंती?

“मनोज मैं तुम्हारे लिए नाश्ता लग रही हूं?”

मोबाइल की घंटी बजती रही थोड़ी देर बाद जयंती ने फोन उठाया।

फोन मनोज की बहन का था “क्या बात है भाभी तुम्हें फोन उठाने तक की फुर्सत नहीं है घर तो बुलाती नहीं हो और ध्यान भी नहीं रखती हो?”

जयंती ने फोन मनोज को थमा दिया।

“भैया क्या है सुबह-सुबह आप भी फोन नहीं उठा रहे हो अपनी बहन को भूल गए हो क्या?”

“नहीं नहीं मैं तुम्हें कैसे भूल सकता हूं? कड़वे झूठ का जहर पी रहा हूं जीवन का सारा रंग ही बेरंग हो गया है।”

“कोई बात नहीं भैया तुम्हारे जीवन में मैं रंग भर देती हूं आज शाम को मैं कुछ दिनों के लिए तुम्हारे पास रहने को आ रही हूं?”

“ठीक है बहन तुम आ जाओ, कम से कम तुम्हारे आने से खाना तो ढंग से मिलेगा।”

मनोज तेज गति से ऑफिस की ओर चला जाता है। जयंती मन ही मन विचार करती रहती है कि सारा दिन मैं सेवा करती हूं जीवन का रंग तो मेरा फीका हो गया है और इन दोनों  बहन भाई के नाटक खत्म ही नहीं हो रहे हैं। अब ये दोनों मिलकर बातों के तीर चलाएंगे।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments