डॉ निशा अग्रवाल
☆ कविता ☆ “बसंत पंचमी:चेतना का उत्सव” ☆ डॉ निशा अग्रवाल ☆
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पीली किरणों ने आकर, धरती का मौन तोड़ा है,
शीत के बोझ तले दबा, हर बीज आज फिर जागा है।
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सूनी डालियाँ कह उठीं, “अब ठहरना व्यर्थ है,”
हवा ने सिखाया धीरे-से, कि परिवर्तन ही सत्य है।
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सरसों हँसी खेतों में, स्वर्णिम स्वप्न बिखराए,
प्रकृति ने जीवन के अर्थ, आज फिर से समझाए।
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बसंत पंचमी केवल, ऋतु का नाम नहीं,
यह अज्ञान से ज्ञान तक, चलने का एक प्रमाण है।
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वीणा के हर स्वर में, विद्या की पुकार बसी,
माँ सरस्वती के आशीष से, हर बुद्धि आज जागी-हँसी।
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आओ, मन की भूमि पर, ज्ञान के बीज बोएँ,
श्रम, सत्य और संस्कार से, अपने भविष्य को संजोएँ।
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बसंत कहता है, “जो सीखता है, वही बढ़ता है,”
ज्ञान की रोशनी में ही, मानव सच में गढ़ता है।
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© डॉ निशा अग्रवाल
शिक्षाविद, पाठयपुस्तक लेखिका एवं वर्ल्ड रिकॉर्ड होल्डर
जयपुर, राजस्थान
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






