मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग
कविता – मटमैले अनुभव
मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग ☆
कुछ पढ़ते, लिखते.., यूँ ही
ज़िंदगी का कोई कसैला स्वाद
कुछ क्षणों को,भुलाए रखता है
फिर धीरे धीरे लौट आता है
वहीं वापस, जहां से बेज़ायका हुए थे
इसके अतिरिक्त..,
अंधेरे में कुछ साये
चारों ओर ऐसे खड़े हो जाते हैं
कि हक़ीक़तों को नकार कर
कोई दायरा तोड़ने नहीं देते
लाख भुलाने के प्रयत्नों के बावजूद
अतीत की लहरों के थपेड़े,हृदय की शिलाओं पर
प्राकृतिक रूप से प्रहार करते हैं
अपने आघातों के माध्यम से ।
फिर नींद की जबर्दस्ती
आखिरकार, आगोश में ले ही लेती है
और,करवट लेती रात को
भोर की चौखट तक ले ही आती है…!!!!!
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© मिर्ज़ा अज़ीज़ बेग
संपर्क – बिलासपुर (छ ग) मो नं 8319743682
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





