श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी के  स्थायी स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अप्रतिम और विचारणीय व्यंग्य  “जान जान की कीमत में अंतर होता है शांतिबाबू…” ।)

☆ शेष कुशल # ५९ ☆

☆ व्यंग्य – “जान जान की कीमत में अंतर होता है शांतिबाबू – शांतिलाल जैन 

यकीन मानिए भाईसाहब, अठारह लाख रूपए प्लस तीन साल के ब्याज का नुकसान हो गया अपन की फेमेली को. रीसेंटली भागीरथपुरे का पानी पी के मरे हैं अपन,  मुआवज़ा मिला दो लाख. जो लोग तीन साल पहले मोरबी के पुल से गुजरते हुए मरे उनको मिला था बीस लाख. अठारह लाख का सीधासट्ट लॉस. पहले पता होता तो अपन भी यमराज को रिक्वेस्ट करके वहीं जा के मर लेते. वैसे भी तीन साल ज्यादा जी के कर क्या लिया अपन ने?  घरवालों की जान खाते रहे,  खाना खर्चा बढ़ाया सो अलग. यमदूत ने भाँप लिया कि मेरे मन में क्या चल रहा है. वह बोला – ‘जीवन की अवधि तय है शांतिबाबू. रिक्वेस्ट करके कुछ हफ़्तों-महीनों का एडजस्टमेंट हो भी जाता,  मगर तीन साल पहले कैसे ले जाते हम तुम्हें?’

मैंने कहा – ‘तो फिर गुजरात के गंभीरा पुल के गिरने में ले जाना था. अभी जुलाई, 2025 में ही गिरा है. उधर मरनेवाले को छह लाख मिले. भले मोरबी से सत्तर परसेंट कम मिलता मगर वह भी इंदौर के से तो तीन सौ परसेंट ज्यादा ही होता. मिलने को तो एक करोड़ भी मिल सकते थे जो अपन एयर इंडिया के हादसे में अहमदाबाद में मरते.’

‘ये मुँह और मसूर की दाल!! मुंसीपाल्टी के बम्बे का पानी पीने वालों को मुआवज़े करोड़ों में नहीं मिला करते.’

‘अच्छा एक बात तो बताओ. जो लोग एयर इंडिया के हादसे में मरे उनको भी तुम इस पैसेंजर भैंसे पर ले कर गए थे!!  उनके लिए वन्दे-भारत भैंसा एक्सप्रेस जैसी अलग से कोई वीआईपी फेसेलिटी नहीं है तुम्हारे पास, पीठ पर एसी फस्ट-क्लास कूपे टाइप लगा हुआ हो कुछ?’ – मैंने पूछा.

‘तुम्हारे निज़ाम की तरह हम जान जान की कीमत में अंतर नहीं किया करते, शांतिबाबू.  इहलोक से आत्मा निकाल लेने के बाद हर जान का मोल एक बराबर है. आत्माएँ तो हम मुंबई की लोकल ट्रेन में लटककर मरने वालों की भी ले जाते हैं,  कुपोषण से मरनेवालों की भी,  बिहार की बाढ़ में बहकर मरनेवालों की भी,  पूस की रात फुटपाथ पर ठण्ड से या जेठ कि दुपहरी में मजदूरी करते करते लू से मरनोंवालों की भी ले जाते हैं. कभी एक धेला मुआवज़ा भी मिला है इनमें से किसी को? तुम्हारे निज़ाम में ख़ामोश हादसों में मरनेवालों को मुआवज़े नहीं मिला करते. वे उन्हीं मामलों में मिला करते हैं जिनमें मिडिया में हो-हल्ला मच जाता है. जितना हल्ला ज्यादा उतना मुआवज़ा ज्यादा.’

कमाल का यमदूत था वो. आया परलोक से था मगर हमारे सिस्टम के बारे में हम से ज्यादा जानता था. उसी ने रेखांकित किया – ‘आर्यावर्त में मनुष्य की जिंदगी का मोल बस कुछेक लाख रुपए रह गया है. हर बड़ी आपदा के बाद अनुग्रह राशि पर घोषित कर के गंगा नहा लेता है शासन प्रशासन. जवाबदेही किसी की नहीं. निज़ाम है कि अपने मरे हुए नागरिकों की गिनती रुपयों में करता है.’

मैं क्या कहता!! बस इतना और पूछ लिया – ‘जो मुझे नरक अलॉट हुआ तो खाने पीने की बैवस्था कैसी रहेगी?’

‘बेफिक्र रहो. एक बार मर लिए हो, अब वहाँ कुपोषण से तो नहीं ही मरोगे और पानी भागीरथपुरे से ज्यादा साफ़ आएगा. कढ़ाई में, जिस तेल में तुम तले जाओगे शांतिबाबू, वो मिलावटी नहीं होगा. कभी सुने हो नरक के किसी स्कूल में मिड-डे मील खाकर पचास शिशु आत्माएँ अवधि पूरी होने से पहले ही गुजर गईं. नरक है तो क्या! हर मुलाज़िम की एक की जवाबदेही तय है. यमलोक का लॉ ऑफ़ टॉर्ट्स अर्यावार्त के क़ानून जितना लचर नहीं है. तुम्हारे देश में ऐसे हादसों के किसी जिम्मेदार ओहदेदार को सज़ा हुई है कभी?’

वह मुझे निरुत्तर करके अंतरिक्ष में प्रवेश कर गया.

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(टीप: यह आवश्यक नहीं है कि संपादक मंडल व्यंग्य /आलेख में व्यक्त विचारों/राय से सहमत हो।)

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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