श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
( ई-अभिव्यक्ति संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों / अलंकरणों से पुरस्कृत / अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं में आज प्रस्तुत है एक समसामयिक विषय पर विचारणीय रचना “अमरबेल”। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन ।
आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं # 52 – अमरबेल ☆
एक – एक कर सीढ़ियों को मिटाते जाना और आगे बढ़ना बहुत अच्छा होता है। पर कभी नीचे आना पड़े तो कैसे आयेंगे पता नहीं। खैर जो होता है उसमें अच्छाई छुपी होती है, ऊपर बैठा व्यक्ति ये सोचता ही नहीं कि वो जमीन से उठकर ही ऊपर गया है।
वक्त के घाव तो समय के साथ -साथ भर जाते हैं किंतु निशान समय की कीमत को समझाने के लिए समय- समय पर प्रश्न करते ही रहते हैं। अक्सर भूल – चूक की उदासीनता में झूलता हुआ मनुष्य ऐसे- ऐसे निर्णय कर बैठता है, जो उसके नीचे से आधार ही खींच सकते हैं। जिम्मेदारी के बोझ के तले दबा हुआ व्यक्ति क्या कुछ करना नहीं चाहता पर होता वही है जो ईश्वर की इच्छा होती है।
जब दिमाग़ बिल्कुल शून्य हो जाए तो क्या करना चाहिए? कुछ न कुछ करते रहना ही सफलता की ओर पहला कदम होता है। जब बाधाएँ आती हैं, तभी तो चट्टानों को काट कर प्रपात बनते हैं; जिससे न केवल जल की राह व स्वरूप बदलता है वरन गतिविधि भी परिवर्तित होकर नया इतिहास रच देती है। कुछ रचने की बात हो तो सत्य का दामन थामकर ही चलना चाहिए क्योंकि कहते हैं कि झूठ के पैर नहीं होते हैं। खैर झूठ के सहारे ही तो व्यक्ति अमरबेल की तरह फैलता जाता है ये बात अलग है कि शुरुआत सच से होती है जो धीरे- धीरे झूठ तक पहुँच जाती है। लोग इसे अच्छी निगाहों से नहीं देखते हैं। ये एक परजीवी बेल है जो जिस वृक्ष पर फैल जाती है उसे सुखा देती है। किंतु इसके अनगिनत लाभ भी होते हैं जो मानव के लिए लगातार फायदेमंद सिद्ध हो रहे हैं।
शरीर की इम्युनिटी बढ़ाने, गठिया रोग, कैन्सर, किडनी, लिवर, दिल, खुजली, डायबिटीज, आँखों में सूजन, मानसिक विकार आदि रोगों को मिटाकर इससे लाभान्वित हो सकते हैं। ये खुद भी अमर है साथ ही इसका उपयोग करने वाले भी इससे लाभ उठाते हैं ये बात अलग है कि जो इसे सहारा दे उसे सुखा कर निर्जीव करती जाती है।
© श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’
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≈ ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय ≈





