डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज  प्रस्तुत है समसामयिक विषय पर आधारित आपका एक अतिसुन्दर व्यंग्य  ‘प्रेम और पाकशास्त्र। इस अतिसुन्दर व्यंग्य रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 145 ☆

☆ व्यंग्य – प्रेम और पाकशास्त्र

बात उन दिनों की है जब शीतल भाई जवान थेऔर अधिकतर युवाओं की तरह प्रेम के रोग में फँसे थे। प्रेम-रोग के कारण उन्हें संपूर्ण जगत प्रेमिकामय दिखायी देता था। सभी रोमांटिक प्रेमियों की तरह वे भी अपनी प्रेमिका की आँखों में आँखें डाले दुनिया जहान को भूले रहते थे। सभी की तरह वे भी अपनी प्रेमिका के मुख, आँखों और ओठों की तुलना चाँद, सितारों, गुलाब वगैरः वगैरः से किया करते थे। उन दिनों उनकी नींद कम हो गयी थी और उनका मन किसी काम में नहीं लगता था। ऑफिस में फाइल खोलते ही पन्ने पर प्रेमिका बैठ जाती थी, और वे सिर पकड़े उसी पन्ने को देखते बैठे रहते थे।

स्वाभाविक रूप से आपके मन में यह जिज्ञासा उठेगी कि शीतल भाई तो अधेड़ावस्था को प्राप्त हुए, किन्तु उनकी इस प्रेमिका का हश्र क्या हुआ। अतः यह स्पष्ट कर दूँ कि आज जो महिला उनके घर में पत्नी के रूप में प्रतिष्ठित है वही उन दिनों उनकी प्रेमिका हुआ करती थी। यह बात आपको आज अविश्वसनीय भले ही लगे लेकिन यह है बिल्कुल सच।

शीतल भाई की पत्नी नीरा जी बताती हैं कि प्रेम के उस दौर में भी वे शीतल भाई को एक दो बार दबी ज़ुबान से बता चुकी थीं कि उन्हें भोजन बनाना नहीं आता, लेकिन शीतल भाई रोमांस के बीच में भोजन जैसी टुच्ची चीज़ का प्रवेश देखकर दुखी हो जाते थे। वे कहा करते थे, ‘तुम भी कैसी घटिया बात लेकर बैठ गयीं। तुम कहो तो मैं तुम्हारे चेहरे की तरफ देखते हुए सारी ज़िन्दगी भूखे प्यासे गुज़ार सकता हूँ। प्रेम दैवी चीज़ है, उसका भला भोजन जैसी भौतिक चीज़ से क्या संबंध?’

जब कभी शीतल भाई नीरा जी के घर जाते थे तो वे उन्हें चाय बना कर ज़रूर पिलाती थीं। लेकिन अक्सर यह होता कि उन्हें चाय देने के बाद नीरा जी ठुड्डी पर हाथ रखकर कहतीं, ‘हाय! मैं चीनी डालना तो भूल ही गयी।’ और शीतल भाई मुग्ध नेत्रों से उनकी तरफ देख कर कहते,’चीनी की ज़रूरत नहीं है। तुम सिर्फ अपनी उँगली चाय में डालकर हिला दो। चाय मीठी हो जाएगी।’ नीरा जी दुबारा ठुड्डी पर उँगली रख कर कहतीं, ‘ हाय! मेरी उँगली जल नहीं जाएगी?’ और शीतल भाई उनकी इस अदा पर निहाल हो जाते। वे मिठास के लिए नीरा जी की तरफ देखते हुए बिना शकर की चाय पी जाते।

इसी प्रकार शीतल भाई का प्रेम फलता फूलता रहा और अन्त में वे दोनों शादी को प्राप्त हो गये। शादी के बाद भोजन बनाने की समस्या सामने आयी। शीतल भाई भी महसूस करने लगे कि खाली प्रेम की ख़ूराक पर ज़िन्दगी ज़्यादा दिन नहीं चल सकती। मुश्किल यह थी नीरा जी पाक कला में बिल्कुल ही अनाड़ी थीं। उनसे न सब्ज़ी काटते बनता, न आटा गूँधते। आग पर रखे बर्तन वे हाथों से ही उठा लेतीं और फिर ‘हाय माँ’ कह कर उन्हें ऊपर से छोड़ देतीं।

एकाध बार जब शीतल भाई ने उनसे पूछा कि बर्तन कैसे गिर गया तो उन्होंने नूरजहाँ की तरह दुबारा पटक कर बता दिया कि कैसे गिर गया। लेकिन शीतल भाई के साथ दिक्कत यह थी कि वे सलीम की तरह कोई राजकुँवर नहीं थे।वे मध्यवर्गीय परिवार के थे और बर्तनों के गिरने से उनके दिमाग में झटका लगता था।

आरंभ में उन्हें पत्नी का पाक कला में  अनाड़ीपन नहीं अखरा। वे हँसते हुए होटल से भोजन ले आते और अपने हाथों से पत्नी को खिलाते थे। लेकिन जब आधी से ज़्यादा तनख्वाह पेट में जाने लगी तब शीतल भाई की प्रेमधारा का पाट कुछ सँकरा होने लगा। अब वे धीरे से कुनमुना कर पत्नी से कहते कि उसे भोजन बनाना सीखना चाहिए था। लेकिन पत्नी अभी तक अपने को प्रेमिका ही समझे बैठी थी। वह उनकी बात पर मुँह चिढ़ा कर सबेरे नौ बजे तक आराम से सोती रहती।

अन्ततः प्रेमशास्त्र में अर्थशास्त्र की दीमक लगने लगी। अब शीतल भाई खुलकर पत्नी से कहने लगे कि वह कौन सा बाप के घर से दहेज ले कर आयी है जो वे उसे होटल से ला ला कर खिलाते रहें। अब पत्नी उनकी बात सुनकर आँसू बहाती। वह रसोईघर में जाकर कुछ खटपट भी करती, लेकिन बात कुछ खास बनी नहीं।

अन्त में अंग्रेजी कहावत के अनुसार उनकी गृहस्थी की नाव पानी से निकलकर चट्टान पर चढ़ने लगी, अर्थात उसके टूटने की नौबत आने लगी। जब नीरा देवी को यह खतरा स्पष्ट दिखायी देने लगा तब उन्होंने घबराकर मेरी पत्नी की शरण ली।

हमने चुपचाप उन्हें पाकशास्त्र का प्रशिक्षण दिया। जब वे कुछ दक्ष हो गयीं तो हमने शीतल भाई को बिना कुछ बताये उनका बनाया भोजन खिलाया। जब शीतल भाई ने उस भोजन की प्रशंसा की तो हमें बात कुछ बनती हुई लगी। उसके बाद हमने नीरा जी की पकायी हुई वस्तुएँ उन्हीं के घर भेजीं और शीतल भाई ने उनकी भी खूब तारीफ की। तब हमने उन्हें बताया कि वे वस्तुएँ किसने बनायी थीं। परिणाम यह हुआ कि शीतल भाई की सूखती हुई प्रेम-बेल फिर हरी हो गयी और उनकी गृहस्थी की नाव फिर चट्टान से उतर कर पानी में तैरने लगी।

चूँकि अब नीरा देवी अपने पति के हृदय प्रदेश पर पुनः आधिपत्य कर चुकी हैं, अतः वे शीतल भाई को आड़े हाथों लेने से चूकती नहीं हैं। वे साफ-साफ कहती हैं कि शीतल भाई के हृदय में पहुँचने का रास्ता उनके पेट से होकर जाता है। शीतल भाई यह सुनकर शर्मा कर हँस देते हैं।

अन्त में एक बात और।अब इतिहास अपने को दुहरा रहा है। जिस तरह पचीस तीस वर्ष पहले शीतल भाई प्रेम-पीड़ित थे उसी तरह अब उनका बड़ा पुत्र भी आजकल एक कन्या के प्रेम में गिरफ्तार है। वह भी आजकल चाँद सितारों की दुनिया में रहता है। शीतल भाई इस बात को लेकर परेशान हैं।

एक दिन मेरे ही सामने शीतल भाई पुत्र से कहने लगे, ‘भैया, यह पता तो लगा लो कि वह खाना बनाना जानती है या नहीं।’

उनका पुत्र ताव खाकर बोला, ‘पापाजी, मैं आपसे कई बार कह चुका हूँ कि आप मुझसे ऐसी घटिया बात न किया करें, लेकिन आप मानते ही नहीं।’

और शीतल भाई बड़ी करुण मुद्रा बनाकर मेरी तरफ देखने लगे।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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रंजना लसणे

अतिसुंदर