डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम व्यंग्य रचना – ”खुसखबरी’ की मार’। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 245 ☆

☆ व्यंग्य – ‘खुसखबरी’ की मार

 ‘हलो!’

‘हलो!’

‘जी, गप्पू दादा से बात कराइए।’

‘हम उनकी वाइफ बोल रहे हैं। वे आराम कर रहे हैं। हमें बताइए, क्या काम है? उनें बता देंगे।’

‘जी, उन्हें एक खुशखबरी देनी थी।’

‘कैसी खुसखबरी?’

‘उन्हें बताइएगा कि जुगाड़ूलाल का फोन आया था। कल शाम पाँच बजे हमें मानस भवन में मंत्री जी के हाथों से पच्चीस हजार का पुरस्कार दिया जाएगा। कार्यक्रम में गप्पू दादा पधारें तो हमें बड़ी खुशी होगी।’

‘आपने इनाम के लिए किसी से सिफारिस करायी होगी।’

‘राम राम! कैसी बातें करती हैं, भाभी!  ये हमारी समाज सेवा का इनाम है।’

‘ठीक है। बधाई आपको। लेकिन उन्नें अभी कोई भी खुसखबरी देने से मना किया है।’

‘क्यों भला?’

‘पिछले दो तीन दिन में उनें तीन चार खुसखबरी मिली थीं। उनें सुनके उनकी तबियत खराब हो गयी थी। बोला है कि अभी दो तीन दिन तक उनें कोई खुसखबरी न बतायी जाए।’

‘अरे, यह तो बड़ी गड़बड़ बात है। दोस्तों को खुशखबरी नहीं देंगे तो किसे देंगे?’

‘वो ठीक है, लेकिन ज्यादा खुसखबरी सुनने से उनकी तबियत बिगड़ जाती है। उन्नें कहा है कि उनें हफ्ते में दो तीन खुसखबरी से ज्यादा न बतायी जाएं। इस्से ज्यादा खुसखबरी झेलना उनके बस में नहीं है।’

‘ठीक है, भाभी। आप जब ठीक समझें, उन्हें बताइएगा। उनकी तबियत का ध्यान रखना हमारा फर्ज है। नमस्ते।’

‘नमस्ते।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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