डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘हमारे नगर में मनभावन सावन‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # 294 ☆

☆ व्यंग्य ☆ हमारे नगर में मनभावन सावन

मैं अपने दरवाजे पर कुर्सी डाले बैठा हूं और बाहर वर्षा हो रही है, कवियों के शब्दों में ‘टापुर टुपुर’। किसी कवि को यह नायिका की ‘रुनझुन’ की याद दिलाती है, किसी को ‘छनछन’ की। रोमांटिक मिजाज़ के कवियों को आकाश में फैले काले मेघों में किसी मुग्धा की केश राशि नज़र आती है।मेरे मन से भी कविता फूट रही है। गुनगुनाने को जी कर रहा है।

बारिश ज़ोर पकड़ रही है। आसपास पड़े खाली प्लॉट भर रहे हैं। ये प्लॉट वर्षों से ऐसे ही खाली पड़े हैं। कारण यह है कि उनके मालिकों को विश्वास है कि एक दिन ये सोना उगलेंगे। ये प्लॉट साल के ज़्यादातर दिन दुखिया की आंख से डबडबाये रहते हैं। बारिश ज़्यादा होती है तो ये अपना अतिरिक्त जल सड़क को सौंप देते हैं।

बारिश और ज़ोर पकड़ रही है। अब मेरे मन से नायिका और कविता लुप्त हो रही है। कारण  यह है कि स्थानीय प्रशासन ने जो नगर के क्षेत्रों का ‘उचले’, ‘बिचले’ और ‘निचले’ के बीच वर्गीकरण किया है उसके हिसाब से मेरी कॉलोनी ‘निचले’ क्षेत्र में आती है। जब ज़्यादा वर्षा होती है तब नगर के अनेक नालों का जल हमारी कॉलोनी से प्रवाहित होता है। नगर में किसी की कोई चीज़ पानी में बह जाए तो कृपया हमें सूचित करें। हम अपनी कॉलोनी में उसे ज़ब्त करके आपकी सेवा में प्रेषित कर देंगे।

पहले यह नगर तालों (तालाबों )के लिए प्रसिद्ध था। अब नालों के लिए मशहूर है। कभी  यहां 30-35 तालाब  थे। वे सब पुर गये। उन पर बसी बस्तियों को अब पुराने तालों के नाम से जाना जाता है।अब नगर की शोभा के लिए नाले ही बचे हैं। हमारा नगर- निगम साल भर उन्हीं की साज-संवार में लगा रहता है।

आदिकाल से कवि वर्षा के सौन्दर्य पर सिर धुनते रहे हैं। ये सब ‘उचले’ या कम से कम ‘बिचले’ क्षेत्र के वासी रहे होंगे,अन्यथा वर्षा के सौन्दर्य से अभिभूत होने के बजाय ‘नर्वस ब्रेकडाउन’ के शिकार होकर शोकगीत लिख रहे होते।

अब घंटों से घनघोर वर्षा हो रही है। जल्दी ही नगर के पानी की शोभायात्रा हमारी कॉलोनी से गुज़रेगी। थोड़ी और प्रतीक्षा कीजिए। नालों का यह  पावन जल हमारे घरों में प्रवेश कर हमारा पानी उतारेगा। जिन लोगों ने वर्ष भर के लिए बोरों में गल्ला जमा कर रखा है वे चिन्तित हैं।

इसीलिए संग्रह की प्रवृत्ति बुरी मानी जाती है। जो सिर्फ महीने-पंद्रह दिन के लिए ही गल्ला खरीद पाते हैं वे हल्के हैं।

‘रामायण’ में राम ने कहा था ‘घन घमंड गर्जत घनघोरा, प्रिया हीन डरपत मन  मोरा।’ हमारी कॉलोनी में जिन घरों से पत्नी अनुपस्थित होती है वहां पतियों की हालत डर के मारे खराब हो जाती है। कारण यह है कि बारिश के वक्त पत्नी ही सामान को सुरक्षित रखने की सारी दौड़भाग करती है। पतिदेव काम कम करते हैं, हल्ला ज़्यादा मचाते हैं। अन्त में  परेशान होकर पत्नी उनसे कहती है, ‘प्राणनाथ, प्राण मत खाइए। एक तरफ चुपचाप बैठ जाइए और मुझे काम करने दीजिए।’

अब तक पानी कई घरों में प्रवेश कर चुका है। जिनके मकान हाल में बने, ऊंचे हैं वे कमर पर हाथ धरे अपनी सीढ़ियों पर खड़े चिल्ला चिल्ला कर दूसरों का हाल पूछ रहे हैं— ‘शर्मा जी! कहां तक पहुंचा?’, ‘शुक्ला जी! भीतर तक पहुंच गया क्या? अरे राम राम।’ दरअसल वे दूसरों का हाल-चाल पूछ पूछ कर खुद को शाबाशी देते हैं कि उन्होंने कितनी अक्लमन्दी दिखायी जो ऊंचा घर बनवाया। वे भीतर ही भीतर अपनी पीठ ठोक रहे होते हैं।

यह बाढ़ का पानी भी पूंजीवादी होता है। निचले स्तर वालों को परेशान करता है और ऊंचे स्तर वालों को छोड़ देता है।

अब पानी घर के अन्दर है। पानी के साथ अनेक जीव भी बारातियों जैसे अन्दर आ गये हैं। कहीं मेंढक कूद रहा है, कहीं कनखजूरा आकर चिपक गया है, कहीं सर्प-शिशु बल खा रहा है। वैसे मैं सब जीवों से प्रेम करता हूं, लेकिन इस वक्त मेरा मन स्वागत-गीत गाने का नहीं है।

हालात यहां तक बिगड़ चुके हैं कि पोस्टमैन भी बरसात में हमारे क्षेत्र में घुसने से घबराते हैं। एक दिन पोस्टमैन ने मोहल्ले की सारी चिट्ठियां रास्ते में मुझे पकड़ा दीं। कहा, ‘बाबूजी, जरा पहुंचा देना। आपका ही मोहल्ला है।’

अब विवाह-योग्य कन्याओं के पिता हमारे नगर के उचला बिचला क्षेत्र देखकर ही कन्या देते हैं। निचले क्षेत्र वालों को बता दिया जाता है कि सगाई भले ही हो जाए, शादी तभी होगी जब वे उचले या बिचले क्षेत्र में मकान ले लें।

अन्त में सूचनार्थ बता दूं कि हमारी कॉलोनी ने योजना बनायी है कि अगली बार जब हमारे नगर के पवित्र नाले हमारी कॉलोनी से गुज़रेंगे तो कॉलोनी की महिलाएं उनमें दीप प्रवाहित करके वर्षा रानी का अभिनन्दन करेंगीं।

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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