श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

(ई-अभिव्यक्ति में संस्कारधानी की सुप्रसिद्ध साहित्यकार श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’ जी द्वारा “व्यंग्य से सीखें और सिखाएं” शीर्षक से साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ करने के लिए हार्दिक आभार। आप अविचल प्रभा मासिक ई पत्रिका की  प्रधान सम्पादक हैं। कई साहित्यिक संस्थाओं के महत्वपूर्ण पदों पर सुशोभित हैं तथा कई पुरस्कारों/अलंकरणों से पुरस्कृत/अलंकृत हैं। आपके साप्ताहिक स्तम्भ – व्यंग्य से सीखें और सिखाएं  में आज प्रस्तुत है एक विचारणीय रचना विस्तार है गगन में। इस सार्थक रचना के लिए श्रीमती छाया सक्सेना जी की लेखनी को सादर नमन। आप प्रत्येक गुरुवार को श्रीमती छाया सक्सेना जी की रचना को आत्मसात कर सकेंगे।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  – आलेख  # 251 ☆ सफलता का मूलमंत्र…

गुरु चरणों में धारिए, सहज सरल मनप्रीत।

आशिषमय सब काज हो, छोड़ हार अरु जीत।।

*

बिन गुरु पूरण हो नहीं, सकल काज ये जान।

गुरुवर से यह सृष्टि है,  उनसे सकल जहान।।

*

गुरु चरणों में बस रहा, जीवन का  विज्ञान।

गुणा भाग सब छोड़ दे, नेहिल सरस सुजान।।

आत्म मंथन- चिंतन छोड़कर पूर्ण मनोयोग से गुरु आज्ञा को जो शिरोधार्य करता है वो जल्दी ही सफलता  वरण करता जाता है।

खुशी चाहिए- आर्थिक स्वतंत्रता से मिलेगी या सपनों के पूरा होने से ये तो आपके दृष्टिकोण पर निर्भर करता है। उद्देश्य जो भी हो कार्य करते रहना चाहिए। वास्तव में मुझे क्या चाहिए इस पर गुरुवर का मार्गदर्शन मिले तो राह आसान होने लगती है। आलस, टालामटोली व श्रेष्ठ करने की जिद कार्य को अधूरा रखता है। हर मनुष्य में ये ताकत होती है कि वो अपने दिमाग़ पर राज कर सकता है बस सही दिशा की ओर बढ़ने की देर है। चरैवेति – चरैवेति के संकल्प के साथ मंजिल को चल पड़ें उम्मीद से अधिक सहजता से मिलने लगेगा।

©  श्रीमती छाया सक्सेना ‘प्रभु’

माँ नर्मदे नगर, म.न. -12, फेज- 1, बिलहरी, जबलपुर ( म. प्र.) 482020

मो. 7024285788, chhayasaxena2508@gmail.com

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments