डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘दो प्रेम-पत्र इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३१६ ☆

☆ व्यंग्य ☆ दो प्रेम-पत्र

प्राणप्यारे,

कल तुम्हें छोड़कर चली तो आयी लेकिन मुझे लगता है जैसे मेरा सब कुछ वहीं छूट गया। रास्ते में मेरी आंखें भर भर आती थीं, कुछ सूझता नहीं था। गुस्सा भी लगता था कि कहां से यह निगोड़ा पुन्नी का ब्याह आ पड़ा। यहां आकर जो मेरी दशा है सो मैं जानूं कि मेरा राम जाने। खाने पीने की इच्छा नहीं होती, किसी काम में मन नहीं लगता। दिल में टीस सी उठती है, सारा बदन जलता रहता है। प्यारे, लगता नहीं है जी मेरा उजड़े दयार में। दिन को आंखें मूंदे लेटी रहती हूं, रात को तारे गिना करती हूं। फिकर लगी रहती है तुम कैसे रहते हो, क्या खाते पीते हो, परेशान तो नहीं हो? बस प्यारे, मेरी यही प्रार्थना है कि तुम सब को छोड़कर आ जाओ।

तुम्हारी ही दुखिया

चुन्नी

जवाब

प्यारी चुन्नी,

अत्र कुशलं तत्रास्तु। तुम्हारी चिट्ठी कल मिली, पढ़ कर खुशी हुई। समाचार मालूम हुए। तुमने जो बातें लिखीं उनको पढ़कर चिन्ता होती है। तुमने जो लिखा है सो वह तुम्हारी भूल है। यहां तुम्हारा कोई भी जरूरी सामान नहीं छूटा। दोनों अटैची मैंने तुम्हारी सीट के नीचे रख दी थीं। कहीं रास्ते में किसी ने चुरा ली हों तो तुरंत लिखो जिससे मैं खोज करा सकूं। रास्ते में तुम्हारी आंख में कोयले की धूल चली गयी होगी, उसी की वजह से आंख में पानी आता रहा होगा। तुमसे कहा था कि खिड़की के पास मत बैठना लेकिन शायद तुम मानी नहीं। पुन्नी के ब्याह का जहां तक सवाल है तो उसमें गुस्सा करने का कोई मतलब नहीं। ब्याह जून में ही बनता था। पंडितों ने कहा था कि आगे साल भर तक कोई मुहूर्त नहीं निकलता। तुमने जो अपनी हालत लिखी सो बात ठीक नहीं। तुम फौरन किसी डाक्टर को दिखाओ। पैसे की फिकर मत करना, जो लग जाए सो लगा देना। यहां तो तुम बिल्कुल ठीक थीं, वहां क्या हो गया? लगता है ब्याह के घर में वनस्पति वगैरह ज्यादा खा गयीं। अम्मां से कहके तुम अपने खाने का इंतजाम अलग करवा लेना। ये  उजड़े दयार में तुम कहां घूमती हो? घर के सामने तो कहीं उजाड़ है नहीं। लगता है तुम पीछे बगीचे में घूमती हो। उजड़े बगीचे में कहां मन लगेगा? घर में सबके साथ हंसा बोला करो तो मन लगे। तुम्हारे तारे गिनने की बात पढ़ कर हंसी आती है। पगली, तारे तो इतने सारे हैं, भला तुम उन्हें कहां गिन पाओगी? मेरा खाना पीना सब नट्टू के होटल में चलता है। पट्ठा बढ़िया कोरमा बनता है, तबियत खुश हो जाती है। मुझे कोई परेशानी नहीं है। तुमने जो मेरे आने की बात लिखी सो बहुत मुश्किल है। अभी बहुत सी जरूरी फाइलें निपटाने को हैं, भला उन्हें छोड़ कर कैसे आ जाऊं?
खत का जवाब जल्दी देना। अम्मांजी  बाबूजी को चरन छूना। टुल्लू ,मुंडू को प्यार।

तुम्हारा पति

छोटेलाल

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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