डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम एवं विचारणीय व्यंग्य – ‘विदेश का गड़बड़झाला‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३२५ ☆
☆ व्यंग्य ☆ विदेश का गड़बड़झाला ☆
ऑस्ट्रेलिया से एक भारतीय लड़की ने वीडियो डाला। लड़की ने वहां के सिस्टम के बारे में जो बताया उसे सुनकर बहुत परेशान हूं। बताया कि वहां भुगतान मेहनत के हिसाब से मिलता है, शैक्षणिक योग्यता या अनुभव के आधार पर नहीं। एक घंटे के श्रम के 25 डॉलर मिल जाते हैं और आदमी दिन में कम से कम 50 डॉलर कमा ही लेता है।
लड़की ने यह भी बताया कि वहां सबसे ज़्यादा भुगतान शारीरिक श्रम करने वालों— जैसे प्लंबर, इलेक्ट्रीशियन, खदान श्रमिकों, निर्माण श्रमिकों— को मिलता है। इन्हें ‘प्रोफेशनल्स’ का नाम दिया जाता है, और समाज में सबको बराबर सम्मान मिलता है, कोई ऊंचा नीचा का भेद नहीं।
लड़की की बात सुनकर दिमाग ख़राब हो गया। यह कैसा देश है, भाई, जहां पांचों उंगलियों को बराबर माना जाता है। हमारे देश में ऐसा हो जाए तो हाहाकार मच जाए। फिर जाति- प्रथा का मतलब ही क्या रह जाएगा? ऑस्ट्रेलिया में जिन्हें ‘प्रोफेशनल्स’ कह कर अच्छा वेतन देते हैं उन्हें यहां दिन में चार-पांच सौ कमाने में देवता याद आ जाते हैं। समाज में इज़्ज़त पाने की बात करें तो देश में इन ‘प्रोफेशनल्स’ को कोई बैठने के लिए स्टूल नहीं देता, कुर्सी की बात छोड़ दीजिए। ज़्यादातर को शस्य श्यामला भूमि पर ही आसन मिलता है। ‘डिगनिटी ऑफ लेबर’ यानी श्रम की प्रतिष्ठा का यह हाल है कि बड़ा आदमी वही माना जाता है जो अपने हाथ से लेकर पानी भी न पिये।
ऑस्ट्रेलिया जैसा किस्सा न्यूज़ीलैंड का भी सुनने को मिला था जहां मेरे एक परिचित प्रोफेसर किसी अध्ययन के लिए गये थे। वहां उनके दफ्तर में सफाई कर्मी आता था जिसे ‘जेनिटर’ कहते थे। जब प्रोफेसर साहब के भारत लौटने का वक्त आया तो जेनिटर ने उन्हें अपने घर पर भोजन के लिए आमंत्रित किया और शाम को उन्हें अपनी कार से घर ले गया। वहां उनके लिए विशेष तौर से शाकाहारी भोजन तैयार कराया गया था। मैंने सोचा कि यदि भारत में कोई सफाई कर्मचारी हमें भोजन के लिए आमंत्रित करे तो हम उस आमंत्रण से बचने की कोशिश करेंगे। सोचेंगे कि इस बंदे के पास खुद के खाने को है या नहीं, या हमें ऐसे ही न्योत रहा है। लगेगा कि उसका दिमाग़ चल गया है।
हमारे यहां सबसे अधिक पैसा उन्हें मिलता है जो कम से कम श्रम करते हैं। कुर्सी पर बैठकर काम करने वालों का भुगतान लाखों में होता है, लेकिन काम का आकलन कोई नहीं। इसीलिए मोटापे और उच्च रक्तचाप का रोना आम है। शारीरिक श्रम करने वाले का जीवन एक-एक दिन के हिसाब से चलता है। कल का कोई भरोसा नहीं। कभी एक अधिकारी के बारे में सुना था जिन्होंने अपना एक कोट कुर्सी पर स्थायी रूप से टांग दिया था। वे खुद दफ्तर से ग़ायब रहते थे, लेकिन किसी के पूछने पर कोट की तरफ इशारा कर दिया जाता था कि ‘यहीं कहीं गये हैं।’ ऐसे ही नौकरी करते-करते वे वैतरणी पार कर गये।
कुर्सी की शोभा बढ़ाने वालों को तनख्वाह के अलावा एक और भत्ता मिलता है जिसे रिश्वत-कम-कमीशन भत्ता कहते हैं। जितना बड़ा और ताकतवर पद, उतना ही ज़्यादा रिश्वत-भत्ता। कई अफसर हर सरकार के प्रियपात्र बने रहते हैं तो कई हर सरकार की आंख में चुभते हैं। हरियाणा में आई. ए. एस. खेमका जी हर छः महीने में ट्रांसफर झेलते अंततः रिटायर हो गये। उनके रिटायर होने पर बहुतों ने राहत की सांस ली होगी।
दूसरी तरफ, असंगठित क्षेत्र के श्रमिक को पूरी मज़दूरी मिल जाए, वही बहुत है। उसमें भी ठेकेदार का कमीशन कटता है। बिना सुरक्षा- उपकरण के कहीं बिजली के खंभे पर सुधार के लिए चढ़ा दिया जाता है तो कहीं बिना सुरक्षा- उपकरण के गैस से भरे सीवर में उतार दिया जाता है। ‘चढ़ जा बेटा सूली पर, भली करेंगे राम।’
ऐसे में हमें लगता है कि हमें अपने देश से परसाई के इंस्पेक्टर मातादीन की तरह कुछ अधिकारियों को ऑस्ट्रेलिया और न्यूज़ीलैंड जैसे देशों में भेजना चाहिए जो वहां के सिस्टम में ज़रूरी सुधार करवा सकें। अभी तो लड़की की बातें सुनकर मेरे दिमाग़ ने काम करना बन्द कर दिया है।
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






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