स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”
(संस्कारधानी जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया। वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत है, आपके काव्य संग्रह ‘शब्द नहीं रहे शब्द‘ की एक भावप्रवण कविता – वन्देमातरम्…।)
साप्ताहिक स्तम्भ – लेखनी सुमित्र की # २७४ – वन्देमातरम्
(काव्य संग्रह – शब्द नहीं रहे शब्द से )
प्रतिध्वनि टकराती है कानों से
झंकार उठती है प्राणों से
वन्देमातरम्! वन्देमातरम्!
और मैं
कुछ जागा सा,
कुछ
सोया सा
अतीत में खोया सा- देखता हूँ
मानवों का महासागर
उत्ताल तरंगों से नक्कारे और नारे
तरह तरह की बोलियाँ
चलती हुई गोलियाँ
और
पूरे जोश से उच्चरित होता- वन्देमातरम्।
आज लगता है
हम तुम ये वे सब
वन्देमातरम् का मर्म भूल गये
वे कौन थे. कैसे थे
जो वन्देमातरम् गाकर
फाँसी पर झूल गये?
वे भारत माँ की संतानें
हिन्दू, मुसलमान, सिक्ख
या नहीं ईसाई थे
वे तो राष्ट्रभक्त इंसान थे
भाई-भाई थे।
उन्होनें जीवन में उतारा था
जननी जन्भूमिश्च स्वर्गादपि गरीयसी
का महामन्त्र
और विफल किये थे
अंग्रेजी सल्तनत के षड्यन्त्र ।
हम
मन्त्ररहित होकर
षडयन्त्रों में घिर गये हैं
गिर गये हैं- दलों के दलदल में
बहुत नीचे
और आँख मींचे
बैठे हैं शुतुरमुर्ग की मुद्रा
हमें दिखाई नहीं देती
में।
कृ
प्रपा
पूर्वोत्तर की आग
या केसर क्यारी के नाग
हम तो
छाती से चिपटाये हैं
जाति-धर्म-भाषा और प्रदेश
हमें कैसे याद रहेगा
वन्देमातरम् का सन्देश ।
है
एक ओर है हमारा क्षुद्र अहम्
ओर दूसरी ओर है
वन्देमातरम्!
© डॉ. राजकुमार “सुमित्र”
साभार : डॉ भावना शुक्ल
112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






सादर नमन वंदे मातरम्