सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(संस्कारधानी जबलपुर की सुप्रसिद्ध साहित्यकार सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ ‘जी सेवा निवृत्त जिला एवं सत्र न्यायाधीश, डिविजनल विजिलेंस कमेटी जबलपुर की पूर्व चेअर पर्सन हैं। आपकी प्रकाशित पुस्तकों में पंचतंत्र में नारी, पंख पसारे पंछी, निहिरा (गीत संग्रह) एहसास के मोती, ख़याल -ए-मीना (ग़ज़ल संग्रह), मीना के सवैया (सवैया संग्रह) नैनिका (कुण्डलिया संग्रह) हैं। आप कई साहित्यिक संस्थाओं द्वारा पुरस्कृत एवं सम्मानित हैं। आप प्रत्येक शुक्रवार सुश्री मीना भट्ट सिद्धार्थ जी की अप्रतिम रचनाओं को उनके साप्ताहिक स्तम्भ – रचना संसार के अंतर्गत आत्मसात कर सकेंगे। आज इस कड़ी में प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम गीत – नेह-डोर…।
रचना संसार # ८४ – गीत – नेह-डोर… ☆ सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
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मत जाना तुम कभी छोड़ कर,
रात-दिवस मैं जगता हूँ।
तुम ही तुम हो इस जीवन में,
याद तुम्हें बस करता हूँ।।
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प्रिये सामने जब तुम रहती,
मन पुलकित हो जाता है।
लेता है यौवन अँगडाई,
माधव फिर प्रिय आता है।।
प्रेम सुमन पल-पल खिल जाते,
भौरों-सा मैं ठगता हूँ।
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तुम ही तुम हो इस जीवन में,
याद तुम्हें बस करता हूँ।।
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नेह डोर तुमसे बाँधी है,
जन्म- जन्म का बंधन है ।
साथ न छूटे अब प्रियवर भी,
प्रेम ईश का वंदन है ।।
मेरे उर में तुम बसती हो,
नाम सदा ही जपता हूँ ।
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तुम ही तुम हो इस जीवन में,
याद तुम्हें बस करता हूँ।।
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रूप -अनूप बड़ा मनमोहन,
तन में आग लगाता है ।
आलिंगन को तरस रहा मन,
हमें बहुत तडपाता है।।
चंचल चितवन नैन देख कर,
ठंडी आहें भरता हूँ।
*
तुम ही तुम हो इस जीवन में,
याद तुम्हें बस करता हूँ।।
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© सुश्री मीना भट्ट ‘सिद्धार्थ’
(सेवा निवृत्त जिला न्यायाधीश)
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