श्री श्याम खापर्डे

(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “बाप की व्यथा…”।

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २५९ ☆

☆ # “बाप की व्यथा…” # ☆

सुबह-सुबह मॉर्निंग वॉक पर

हमारे एक पुराने मित्र से मुलाकात हुई

हाय हेलो के बाद बैठकर बात हुई

हमने पूछा-

यह क्या हाल बनाया है ?

क्या कोई बीमारी का तुम पर साया है  ?

वह बोला यार

क्या बताऊं?

कैसे जी रहा हूं ?

रोज जी रहा हूं

और रोज मर रहा हूं ?

भाई पत्नी के बिना जीना

लोहे के चने चबाना है

रोज जीना है रोज मरना है

छोटे बेटे के परिवार के साथ रहने लगा,

उनको ही अपना कहने लगा

कहने को तो तीन बेटे है

पर वह दोनों अपने परिवार में मस्त है

अपने आप में ही व्यस्त है

 

कुछ दिनों बाद परिवार में अचानक कलह हो गई

घर और संपत्ति वजह हो गई

दोनों बेटे आकर अपना हक मांगने लगे

हम कशमकश में रात भर जागने लगे

समझाने पर भी वह दोनों नहीं माने

रोज बहू बेटे आकर मारने लगे ताने

थक हारकर

हमने घर और संपत्ति बेचकर

तीनों में बराबर बांट दिया

अपना हिस्सा नहीं लिया

मैंने पूछा-

मैं कहां रहूंगा ?

कैसे जिऊंगा ?

 

उन्होंने चार-चार महीने के लिए मुझे आपस में बांट दिया

मेरी सहमति या असहमति का कोई विचार नहीं किया

तब से हर एक के पास चार-चार महीने रहता हूं

बहू बेटे के अत्याचार चुपचाप सहता हूं

कोई प्यार या कोई लगाव नहीं है

रुखे सूखे खाने में कोई चाव नहीं है

सब लोग एक-एक दिन गिनते हैं

4 महीने से एक दिन भी ज्यादा रहने नहीं देते है

मैं आजकल कुत्ते की तरह जी रहा हूं

जीते जी यह जहर पी रहा हूं

साहब मैंने जो गलती की है

वह कोई ना करें

जीते जी अपना घर और संपत्ति

बच्चों के नाम ना करें

मैं आज पैसे पैसे के लिए मोहताज हूं

कल था संपन्न

पर फकीर आज हूं

मैंने कहा-

भाई निराश ना हो

धैर्य न छोड़

कानून की सहायता ले

आस ना छोड़

वृद्ध दंपति के भरण पोषण के लिए

संतान जिम्मेदार है

कानून का राज है

न्यायालय में जाना

हमारा अधिकार है

तुम आवेदन लगाओ

और अपना हक पाओ

रिश्तो के मोह में पड़कर

तुम भावनाओं में बह गए

अपना सब कुछ लुटा दिया

अब कहीं के नहीं रहें

 

तुम्हें मेरी दोस्ती का वास्ता है

कानून की शरण ही एक रास्ता है/

© श्याम खापर्डे 

फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो  9425592588

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’  ≈

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