स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व  प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी  द्वारा रचित – “कविता  – श्रमिक। हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी  काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।) 

☆ काव्य धारा # २६३

☆ श्रमिक…  स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

दुनियाँ वही धनी निर्धन की लेकिन बँटी बंटी

आपस के व्यवहारो में पर कभी न बात पटी

फिर भी धनिकों की सेवा में रहे गरीब डटे

*

धन ने श्रम को दिया प्रताड़ित कभी न स्नेह दिया

तब भी श्रमिकों ने धनियों का सेवा कार्य किया

कटीनाई आने पर भी कभी पीछे नहीं हटे

*

मन में साधे कल की आशा , सब दुख-दर्द सहे

करते मदद सदा धनिको की आगे रहे खड़े

मुँह को  बाँधे हाथ बढ़ाये पहने वस्त्र फटे

*

दोनों की आशा अभिलाषा में अन्तर भारी

मन को मारे मजदूरी में उम्र कटी सारी ॥

बीमारी में न बोले, वेतन भले कटे ॥

© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’

साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’

ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी  भोपाल ४६२०२३

मो. 9425484452

vivek1959@yahoo.co.in

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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