श्री श्याम खापर्डे
(श्री श्याम खापर्डे जी भारतीय स्टेट बैंक से सेवानिवृत्त वरिष्ठ अधिकारी हैं। आप प्रत्येक सोमवार पढ़ सकते हैं साप्ताहिक स्तम्भ – क्या बात है श्याम जी । आज प्रस्तुत है आपकी भावप्रवण कविता “प्रकाश पुंज…”।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ क्या बात है श्याम जी # २६० ☆
☆ # “प्रकाश पुंज…” # ☆ श्री श्याम खापर्डे ☆
(14 अप्रैल डा आंबेडकर जयंती पर विशेष)
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चीरकर सदियों का अंधेरा
सूर्य हमारा निकला था
ताप से जिसके बेड़ियों का लोहा
धीरे-धीरे पिघला था
बह रहा था लहू
जख्मी हाथ और पांव से
बहिष्कृत थे हम
समाज और गांव से
दूषित हो जाते थें लोग
अशुचि हमारी छांव से
प्रभाकर की प्रभा से
जल उठा गरल
जो हमने निगला था
चीरकर सदियों का अंधेरा
सूर्य हमारा निकला था
कुआं हमने खोदा
पर जल पर हमारा हक नहीं था
फसल बोई, काटी
पर अन्न पर हमारा हक नहीं था
पौधा लगाया वृक्ष बनाया
पर फल पर हमारा हक नहीं था
लिखकर नया अध्याय
उसने पुराना अध्याय बदला था
चीरकर सदियों का अंधेरा
सूर्य हमारा निकला था
शिक्षित बनो यह मंत्र देकर
उसने अभियान चलाया
संगठित रहो यह मन्त्र देकर
उसने अभिमान जगाया
संघर्ष करो यह तंत्र देकर
उसने स्वाभिमान बढ़ाया
जीने की राह दिखाने
वह प्रकाश पुंज अकेला निकला था
चीरकर सदियों का अंधेरा
सूर्य हमारा निकला था
तूफानों से लड़कर
पर्वतों में राह बनाई
बुझीं बुझीं आंखों में
जीने की चाह जगाई
कमजोरों को गले लगा कर
सबको अपनी बांह थमाई
शक्तिमान बनाया समाज को
जो कभी दुबला था
चीरकर सदियों का अंधेरा
सूर्य हमारा निकला था
उसने आसमान को झुकाया
विद्वत्ता के दम पर
उसने जर्रे जर्रे को चमकाया
उपकार किया हम पर
उसने रोशनी का दिया जलाया
वार किया तम पर
आलोकित हुए पथ पर
जन सैलाब उबला था
चीरकर सदियों का अंधेरा
सूर्य हमारा निकला था
दया करुणा प्रेम हो जिसमें
वही सच्चा इंसान है
वंचितो शोषितो पीड़ितों के
हर सांस का वह प्राण है
रोम रोम में बसा
वह मानव नहीं भगवान है
रूढ़ियों को तोड़कर
जिसने व्यवस्था को बदला था
चीरकर सदियों का अंधेरा
सूर्य हमारा निकला था
ताप से जिसके बेड़ियों का लोहा
धीरे-धीरे पिघला था /
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© श्याम खापर्डे
फ्लेट न – 402, मैत्री अपार्टमेंट, फेज – बी, रिसाली, दुर्ग ( छत्तीसगढ़) मो 9425592588
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






