डॉ.राजेश ठाकुर

( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का  मंतव्य उनके ही शब्दों में –पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “परिन्दे“.)  

? साप्ताहिक स्तम्भ ☆ नेता चरित मानस # २८ ?

? कविता – परिन्दे… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर  ? ?

?

=1=

ऋतु विशेष में दूर देश से, ख़ास परिंदे आते हैं

बच्चे यूँ त्यौहारों में, मेहमान सरीखे आते हैं

 =2=

हेलमेल के मिसरी जैसे, जाने कहाँ गये वो दिन

अब रिश्तों की नीरसता ज्यों, फल भी फीके आते हैं

=3=

पीढ़ी नई, मृदंग नगड़िया रसिया फगुआ क्या जाने

इनको तो बस डी.जे.वाले, तौर-तरीक़े आते हैं

=4=

हँसी-ठिठोली न पहले-सी, हुई दिल्लगी भी ग़ायब

रंग लगाने के वो दिलकश, किसे सलीक़े आते हैं

=5=

देख दूसरों को संकट में, जश्न मनाती है दुनिया

लम्हे आगे-पीछे अच्छे-बुरे सभी के आते हैं

=6=

हमसे मिलने उमड़-घुमड़कर, देखो काले बादल भी

प्यार जताने समय-समय पर, पास ज़मीं के आते हैं

=7=

हमको भी ताउम्र फर्ज़ की, रीत निभानी होती है

तब जीवन के हिस्से में कुछ, ख़ास वज़ीफ़े आते हैं

=8=

इम्तिहान से सीख सबक़, अंज़ाम की कर न फ़िक्र ज़रा

पल जीवन में खट्टे-मीठे, कड़वे-तीखे आते हैं

=9=

‘ठाकुर’ ठसक दिखाने से यूँ, काम नहीं चलने वाला

कथनी-करनी के दम, ख़ुशियों के दिन नीके आते हैं

© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर

शासकीय कॉलेज़ केवलारी

संपर्क — ग्राम -धतूरा, पोस्ट – जामगाँव, तहसील -नैनपुर, जिला -मण्डला (म.प्र.) मोबा. 9424316071

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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