डॉ कुंदन सिंह परिहार
(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय डॉ कुन्दन सिंह परिहार जी का साहित्य विशेषकर व्यंग्य एवं लघुकथाएं ई-अभिव्यक्ति के माध्यम से काफी पढ़ी एवं सराही जाती रही हैं। हम प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते रहते हैं। डॉ कुंदन सिंह परिहार जी की रचनाओं के पात्र हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं। उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपका एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘साहित्यकारी के दांव-पेंच‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार # ३३३ ☆
☆ व्यंग्य ☆ साहित्यकारी के दांव-पेंच ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆
सयानेलाल ‘साहित्यप्रेमी’ जल्दी ही साहित्य के मामले में सयाने, समझदार हो गये। कुछ दिन कविता कहानी लिखी, फिर समझ गये कि इससे कुछ ठोस हासिल होने वाला नहीं। ऊसर में खेती करना है। संपादक, प्रकाशक के चक्कर काटते रहो। कोई लेखक दूसरे को पढ़ता नहीं, पाठक पीठ देकर बैठा है। कितनी भी चिरौरी करो, कान नहीं देता।
लेकिन इस मायूसी के बीच सयानेलाल ने साहित्य में निहित मुनाफे की संभावनाओं को खोज लिया। लिखने से भले कुछ न मिले, साहित्य-सेवा के और भी आयाम हैं जो फलदायी हो सकते हैं। ‘जिन खोजा तिन पाइयां।’ सिर्फ अक्ल दौड़ाने की ज़रूरत है। उन्होंने सोच विचार करके लेखन के बजाय सम्मान-विमोचन का तुरत फल देने वाला धंधा शुरू कर दिया। अब दस-बीस लेखक उनके चक्कर लगाते रहते हैं, दिन भर फोन आते हैं— ‘बड़े भैया, दो साल से सम्मान नहीं हुआ। कब तक सबर करें? एक बार तो करा दो।’
जल्दी ही सयानेलाल पूरे प्रदेश में सम्मान-विमोचन के विशेषज्ञ के रूप में मशहूर हो गये। अब साल में तीन चार सम्मान कार्यक्रम हो ही जाते हैं। हर कार्यक्रम में कवि-लेखक परिवार और इष्ट-मित्रों सहित पहुंचते हैं। मेले का माहौल बन जाता है। कई सम्मानित भावुक होकर परिवार से लिपटकर रोते हुए दिखायी पड़ते हैं।
सयानेलाल जी की पॉलिसी बिल्कुल साफ है। सम्मान-विमोचन का पूरा खर्चा लेखक को उठाना पड़ेगा। खर्चे की रकम और हिसाब सयाने लाल जी के पास रहेंगे। हिसाब पूछने की मुमानियत है। जो पूछे उससे आंखें तरेरकर कहते हैं, ‘हिसाब मांगना है तो अब आगे सम्मान कराने के लिए हमारे पास मत आना। दो ठो दोहे लिखे नहीं कि सम्मान की लाइन में लग गये।’ सम्मानित सिकुड़ जाता है, दांत निकाल कर कहता है— ‘रहने दीजिए। गुस्सा मत होइए। हमने तो वैसइ पूछ लिया था।’ ज़ाहिर है खर्चे में से सयानेलाल पर्याप्त सेवा-शुल्क बचा लेते हैं।
सयानेलाल पर दबाव सिर्फ विमोचन और सम्मान के लिए ही नहीं होता, उनके कार्यक्रमों में अध्यक्ष या मुख्य अतिथि बनने के लिए भी होता है। कुर्सी-प्रेमी अनेक लोग अध्यक्ष या मुख्य अतिथि बनने के लिए कुछ ‘त्याग’ करने को भी तैयार हो जाते हैं।
एक दिन सयानेलाल नगर के जाने-माने विद्वान डॉक्टर त्रिपाठी के पास पहुंचे। चरण छूकर बोले, ‘आदरणीय,16 तारीख को बीस पच्चीस लेखकों का सम्मान करना है। आप कृपा करके कार्यक्रम की अध्यक्षता स्वीकार कर लें तो कार्यक्रम में चार चांद लग जाएंगे।’ त्रिपाठी जी भले आदमी थे। राज़ी हो गये। बोले, ‘वाहन की व्यवस्था कर देना। मैं आ जाऊंगा।’
सयानेलाल जी पुन: चरण छूकर खुशी खुशी विदा हुए।
कार्यक्रम से तीन दिन पहले अचानक वे फिर त्रिपाठी जी के घर उपस्थित हुए। बड़ी देर तक बैठे उंगलियां मरोड़ते रहे, जैसे किसी असमंजस में हों। थोड़ी देर में बोले, ‘आदरणीय, बड़े धर्मसंकट में हूं। कैसे कहूं? आप विकल जी को जानते होंगे। कविता लिखते हैं। वे पीछे पड़ गये हैं कि इस कार्यक्रम की अध्यक्षता का मौका उनको दूं। दरअसल वे अगले महीने बेटी के पास बंबई जा रहे हैं। कह रहे थे पता नहीं कब लौटना हो, इसलिए मेरे मार्फत आपसे प्रार्थना की है कि इस कार्यक्रम की अध्यक्षता उन्हें कर लेने दें। कहा है कि इस कृपा के लिए आपके बहुत आभारी होंगे। लेकिन मेरे लिए यह बड़े संकट की बात है।’
त्रिपाठी जी ठहरे सज्जन व्यक्ति। तुरंत बोले, ‘ठीक है। वे ही अध्यक्षता करें। क्या फर्क पड़ता है?’
सयाने जी चेहरे पर पश्चात्ताप का भाव पहने बाहर निकले, लेकिन स्कूटर पर बैठते ही उनका भाव बदला और वे मुस्कराते हुए आगे बढ़ गये।
दूसरे दिन त्रिपाठी जी के पास नगर के साहित्यकारों में ‘नारद’ की उपाधि पाये ‘बेदर्द’ जी का फोन आ गया। पूछने लगे, ‘सुना है आप सयाने के कार्यक्रम की अध्यक्षता नहीं कर रहे हैं?’ त्रिपाठी जी ने पूरी जानकारी दी तो ‘बेदर्द’ जी बोले, ‘सयानेलाल बहुत काइंयां है और आप बहुत भोले हैं। विकल जी बड़े प्रचार-प्रेमी हैं। उन्होंने अध्यक्षता के लिए सयाने को ग्यारह हज़ार रुपये का वादा किया है। वे अपने साथ सौ रुपये की दिहाड़ी पर बीस पच्चीस श्रोता भी लाएंगे। साथ ही वे सभी श्रोताओं की चाय का खर्चा भी उठाएंगे। यह सब मुझे खुद सयानेलाल ने बताया। वह विकल जी को बुलाकर बहुत खुश है। आप आजकल की साहित्यकारी के लटके झटके से वाकिफ़ नहीं हैं।’
त्रिपाठी जी हंसकर बोले, ‘ठीक कहते हो, भैया। यह आजकल की साहित्यकारी समझना हम जैसे अनाड़ियों के बस का नहीं है।’
© डॉ कुंदन सिंह परिहार
जबलपुर, मध्य प्रदेश
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





