स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’
(आज प्रस्तुत है गुरुवर स्व प्रोफ. श्री चित्र भूषण श्रीवास्तव जी द्वारा रचित – “कविता – स्वामी विवेकानंद…” । हमारे प्रबुद्ध पाठकगण स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ जी काव्य रचनाओं को प्रत्येक शनिवार आत्मसात कर सकेंगे.।)
☆ काव्य धारा # २७० ☆
☆ स्वामी विवेकानंद… ☆ स्व प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’ ☆
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युवा तापस जिसने ऊंची उठाई धर्म-ध्वजा शिकागो में जिसकी वाणी,
मुग्ध जग सुनता रहा विवेकी, अध्यात्म ज्ञानी तेज था
बंगाल का इसी भारत का समर्पित देश प्रेमी लाल था ।।।।
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जगो, उठो, बढ़ो आगे बराबर बढ़ते रहो
लक्ष्य जब तक पा न जाओ सतत् संकल्पित रहो।
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शक्ति संचय, साधना हो मनुज सेवा के लिए
सदा जागृत भावना हो देश सेवा के लिए ।।2।।
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सिखाया जिसने हमें अपने प्रखर व्यक्तित्व से
विचारों से धर्म से सत्कर्म को अस्तित्व दे।
ज्योति जिसकी आज भी देती है हमको रोशनी
उन विवेकानन्द की तप त्यागमय थी जीवनी ।।3।।
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देती है सबको सहज कर्तव्य की नित प्रेरणा
भरती है हरेक के मन को एक पावन चेतना
उस व्रती के चरणों मेंरख भाव के श्रद्धा सुमन
विश्व सेवा के लिए आओ करें हम आज प्रण ।।4।।
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© प्रो चित्र भूषण श्रीवास्तव ‘विदग्ध’
साभार – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
ए २३३ , ओल्ड मीनाल रेजीडेंसी भोपाल ४६२०२३
मो. 9425484452
≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





