डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है समसामयिक विषय पर आपका एक अप्रतिम विचारणीय व्यंग्य – ‘कलियुग के त्रिदेव’। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३१ ☆

☆ व्यंग्य ☆ कलियुग के त्रिदेव

‘दैनिक खबरची’ का पत्रकार खोजीलाल बहुत परेशान है। रूस-यूक्रेन युद्ध ख़त्म हुआ नहीं और अमेरिका-इज़रायल-ईरान युद्ध के पटाखे फूटने लगे। गज़ा पर इज़रायली आक्रमण से 70000 से ज्यादा बेकसूर मरे। खाने की लाइन में लगे बच्चों पर गोलियां चलीं। अमेरिका की ईरान पर बमबारी से 160 मासूम स्कूली छात्राएं असमय काल-कवलित हुईं। श्रीलंका के पास ईरानी युद्धपोत डुबाने से 80 से ज्यादा ईरानी सैनिक मरे। इस पर प्रेसिडेंट ट्रंप की टिप्पणी थी कि उनके सैनिकों को जहाज़ पर क़ब्ज़ा करने के बजाय उसे  डुबाने में ज़्यादा मज़ा आता है। इन लड़ाइयों में हज़ारों इमारतें ज़मींदोज हुईं, हजारों परिवार बेघर और बर्बाद हुए। लेकिन इस बर्बादी के लिए ज़िम्मेदार राष्ट्राध्यक्षों के माथे पर शिकन नहीं पड़ी। वे हंसते, मज़ाक करते, नृत्य की मुद्राएं बनाते रहे, ‘शत्रु’ की बर्बादी पर बगलें बजाते रहे।

खोजीलाल धार्मिक आदमी है। उसने पढ़ा है कि सृष्टि के सृजन, पालन और विनाश की ज़िम्मेदारी ब्रह्मा, विष्णु और शिव यानी त्रिदेव के हाथों में है। इसीलिए जब वह ज़्यादा विचलित होता है तो आकाश की तरह मुंह उठाकर कहने लगता है— ‘यह क्या हो रहा है प्रभु? आदमी आदमी की जान का दुश्मन बना हुआ है। छोटे-छोटे बच्चे कीड़े मकोड़ों की तरह मर रहे हैं। फिर उन्हें जन्म देने की क्या ज़रूरत थी? क्या यह सब आपकी सहमति से हो रहा है? पाप और अन्याय करने वालों को आप रोकते क्यों नहीं?’

खोजीलाल को युद्ध में कूदने वाले देशों का यह तर्क परेशान करता है कि  वे अपनी सुरक्षा के लिए आक्रमण कर रहे हैं। उसे लगता है कि यदि यह तर्क मान लिया  जाए तो हर देश को अपनी सुरक्षा के लिए दूसरों पर आक्रमण करने का लाइसेंस मिल जाएगा। फिर कानून-कायदे किस लिए हैं?

इन्हीं तर्कों-वितर्कों में उलझा खोजीलाल एक दिन घर आकर सो गया। थोड़ी देर में देखा सामने साक्षात शिवजी खड़े हैं। वही बाघंबर, त्रिशूल, शरीर पर भस्म और कंठ में नाग। लेकिन चेहरे पर बड़ी गंभीरता। खोजीलाल दर्शन करके भावविभोर हुआ, हाथ जोड़कर बोला, ‘दर्शन पाकर कृतार्थ हुआ प्रभु, लेकिन संसार में यह क्या हो रहा है? सृष्टि के विनाशक तो आप हैं लेकिन आदमी आदमी के प्राण लेने पर क्यों तुला है? क्या यह सब आपकी मर्जी से हो रहा है?’

शिवजी कुछ और गंभीर हो गये, बोले, ‘भक्त, तुम्हारा दुख और तुम्हारी चिन्ता सही है, लेकिन जो हो रहा है उसके लिए हम जिम्मेदार नहीं हैं। इसके लिए आदमी ही जिम्मेदार है। ब्रह्मा जी आदमी की रचना ऐसी करते हैं कि मैन्यूफैक्चरिंग डिफेक्ट न हो तो उसका शरीर आराम से सत्तर अस्सी साल तक चलेगा। तुम लोग जो कृत्रिम अंग बनाते हो वे दस पंद्रह साल भी नहीं चलते। तुमने नाना प्रकार के वाहन सड़कों और आकाश में चला कर आदमी की उम्र को अनिश्चित और छोटा किया है। भ्रष्टाचारी लोग भवनों और पुलों में मिलावट करके दूसरों के प्राण लेते रहते हैं। तानाशाह हजारों वर्षों से अपने शक्ति प्रदर्शन के लिए युद्ध का खेल खेलते रहे हैं क्योंकि उसमें जान  सैनिकों और नागरिकों की जाती है। वे खुद सुरक्षित रहते हैं।

‘दूसरे, आदमी ने अपनी तरक्की दिखाने के चक्कर में युद्ध को ज्यादा नुकसानदेह बना दिया है। पहले युद्ध मैदान में सवेरे शुरू होते थे और शाम को बंद हो जाते थे। सैनिकों के घर और परिवार तक तब के अस्त्रों की पहुंच नहीं हो पाती थी। अब शत्रु के नगरों, इमारतों और परिवारों पर हमला होता है जिसमें हजारों निर्दोष मारे जाते हैं। बड़े पैमाने पर बर्बादी होती है, लेकिन इसी को तुम लोग तरक्की बताकर फूले फिरते हो। तुम्हारी करतूतों के लिए हम कहां दोषी हैं? दरअसल अब आदमी ही सृष्टि का पालक और विनाशक बना बैठा है। हमें अप्रासंगिक, आउटडेटेड बताया जाता है।’

सुनकर खोजीलाल हाथ जोड़कर बोला, ‘आप ठीक कहते हैं प्रभु, लेकिन अब इस संसार का क्या होगा?’

शिवजी ने जवाब दिया, ‘मैंने विष्णु जी से बात की है। उन्होंने कभी भस्मासुर का अंत किया था। वे ही कलियुग के भस्मासुरों से निपटने का उपाय बताएंगे।’

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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