डॉ भावना शुक्ल

(डॉ भावना शुक्ल जी  (सह संपादक ‘प्राची‘) को जो कुछ साहित्यिक विरासत में मिला है उसे उन्होने मात्र सँजोया ही नहीं अपितु , उस विरासत को गति प्रदान  किया है। हम ईश्वर से  प्रार्थना करते हैं कि माँ सरस्वती का वरद हस्त उन पर ऐसा ही बना रहे। आज प्रस्तुत हैं – भावना के दोहे – बरगी की करुण व्यथा)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ  # ३२१ – साहित्य निकुंज ☆

☆ भावना के दोहे – बरगी की करुण व्यथा ☆ डॉ भावना शुक्ल ☆

बरगी जल के बाँध में, गूँजी चीख हज़ार।

गोद मिली है नर्मदा, समा रहे जलधार।

*

अश्रु बहे कैसे? रुकें, देखा जब ये त्रास।

हृदय फटा मन रो पड़ा, बुझी जीवनी आस।।

*

करुण दृश्य यह देखकर, मौन रहा आकाश।

सोए नीर समाधि में, कैसे? हों विश्वास।।

*

माँ ने थामा लाल को, लहर बहाती साथ।

बढ़ा रही माँ नर्मदा, देती अपना हाथ।।

*

अन्तस आहत हो रहा, सुनकर करुण पुकार। 

असमय घटना देखकर, मचता हाहाकार।।

© डॉ भावना शुक्ल

सहसंपादक… प्राची

प्रतीक लॉरेल, J-1504, नोएडा सेक्टर – 120,  नोएडा (यू.पी )- 201307

मोब. 9278720311 ईमेल : bhavanasharma30@gmail.com

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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