श्री संतोष नेमा “संतोष”
(आदरणीय श्री संतोष नेमा जी कवितायें, व्यंग्य, गजल, दोहे, मुक्तक आदि विधाओं के सशक्त हस्ताक्षर हैं. धार्मिक एवं सामाजिक संस्कार आपको विरासत में मिले हैं. आपके पिताजी स्वर्गीय देवी चरण नेमा जी ने कई भजन और आरतियाँ लिखीं थीं, जिनका प्रकाशन भी हुआ है. आप डाक विभाग से सेवानिवृत्त हैं. आपकी रचनाएँ राष्ट्रीय पत्र पत्रिकाओं में लगातार प्रकाशित होती रहती हैं। आप कई सम्मानों / पुरस्कारों से सम्मानित/अलंकृत हैं. “साप्ताहिक स्तम्भ – इंद्रधनुष” की अगली कड़ी में आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कविता – ये चुनाव जब भी आते हैं… । आप श्री संतोष नेमा जी की रचनाएँ प्रत्येक शुक्रवार आत्मसात कर सकते हैं।)
☆ साहित्यिक स्तम्भ – इंद्रधनुष # ३०३ ☆
☆ कविता – ये चुनाव जब भी आते हैं… ☆ श्री संतोष नेमा ☆
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ये चुनाव जब भी आते हैं |
देकर लोभ लुभा जाते हैं ||
आए कभी न वर्षों से जो |
गले लगाकर सहलाते हैं ||
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जन नेता बन जाते भिक्षुक |
चरण चूमते छलिया झुक-झुक ||
एक लक्ष्य बस सत्ता पाना |
परिणामों की मन में धुक-पुक ||
जामा पहने जन सेवक का |
अपना परचम फहराते हैं ||
ये चुनाव जब भी आते हैं |
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जाति – धर्म की बातें करते |
वादों के आडंबर रचते ||
वोट खींचने करते साजिश |
दाँव-पेंच में माहिर लगते ||
ये कानून हाथ में लेकर |
प्रतिद्वंदी को धमकाते हैं ||
ये चुनाव जब भी आते हैं |
*
रंग – बिरंगे नारे रटते |
अपने स्वयं कसीदे गढ़ते ||
इनकी मोटी चमड़ी यारो |
लज्जा-शर्म ताक पर रखते ||
इनकी तिकड़म को पहचानो |
जाल वोट का फैलाते हैं ||
ये चुनाव जब भी आते हैं |
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खूब बहाते नेता पैसा |
कोई चतुर न उनके जैसा ||
मत की कीमत पहचानो तुम |
करो न सौदा ऐसा वैसा ||
ध्यान रखें ‘संतोष’ हमेशा |
देश भक्त तब कहलाते हैं ||
ये चुनाव जब भी आते हैं |
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© संतोष कुमार नेमा “संतोष”
वरिष्ठ लेखक एवं साहित्यकार
आलोकनगर, जबलपुर (म. प्र.) मो 7000361983, 9300101799
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





