श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
(हमप्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ जी के आभारी हैं जो साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा” शीर्षक के माध्यम से हमें अविराम पुस्तक चर्चा प्रकाशनार्थ साझा कर रहे हैं । श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) पद से सेवानिवृत्त हुए हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है। उनका दैनंदिन जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास करते हैं।
आज प्रस्तुत है इंजीनियर अनिल कुमार अस्थाना जी द्वारा लिखित “स्मृतियों का वोल्टेज: मेरा जीवन : मेरा संघर्ष ” पर चर्चा।
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा# २०२ ☆
☆ “स्मृतियों का वोल्टेज: मेरा जीवन : मेरा संघर्ष” – लेखक : इंजीनियर अनिल कुमार अस्थाना ☆ चर्चा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
पुस्तक : स्मृतियों का वोल्टेज: मेरा जीवन : मेरा संघर्ष
लेखक : इंजीनियर अनिल कुमार अस्थाना
चर्चा : विवेक रंजन श्रीवास्तव, भोपाल
☆ स्मृतियों का वोल्टेज: कर्मयोग और जीवंत अनुभवों की प्रेरक साहित्यिक यात्रा – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
कृति ‘स्मृतियों का वोल्टेज: मेरा जीवन, मेरा संघर्ष’, सफल इंजीनियर अनिल अस्थाना जी के करियर का लेखा-जोखा, सिद्धांतों की आंच पर तपे कर्मयोगी के अनुभवों का सार है।
यह आत्मकथा पाठक को उत्तर प्रदेश के एक छोटे से गाँव फुलेस की धूल भरी पगडंडियों से विद्युत मंडल के शीर्ष नीति-निर्धारक पदों तक की शब्द यात्रा पर ले जाती है। पूरी पुस्तक में लेखक ने अपनी स्मृतियों को एक ऐसे प्रवाह में पिरोया है कि पाठक स्वयं को उस कालखंड और उन परिस्थितियों का हिस्सा महसूस करने लगता है।
लेखक ने अपनी जड़ों और पारिवारिक पृष्ठभूमि का चित्रण बहुत ही आत्मीयता और यथार्थ भाव से किया है। उनके पिता द्वारा संघर्षों के बीच गढ़े गए स्वाभिमान और श्रम की गरिमा ने लेखक के व्यक्तित्व की आधारशिला रखी। पंतनगर विश्वविद्यालय में शिक्षा के दौरान ‘श्रम की गरिमा’ के जो पाठ उन्होंने सीखे, चाहे वह घास काटना हो या खेल के मैदान की चुनौतियां, वे उनके आगामी पेशेवर जीवन में मार्गदर्शक सिद्धांत बने।
बीएचयू से उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद विदिशा में उनकी पहली पोस्टिंग ने उन्हें यह अहसास कराया कि वास्तविक इंजीनियरिंग फाइलों के बजाय ग्रामीण भारत के उन अंधेरे कोनों में है, जहाँ बिजली की एक किरण जीवन बदल देती है।
लेखक के पेशेवर सफर में रायसेन के घने जंगलों की चुनौतियाँ हों या ग्वालियर की वर्कशॉप में किए गए नवाचार, हर अध्याय उनके ‘लीक से हटकर’ सोचने की क्षमता को दर्शाता है। विशेष रूप से रीवा में उनके कार्यकाल के दौरान भ्रष्टाचार और बिजली चोरों के खिलाफ की गई ‘सर्जिकल स्ट्राइक’ उनके निर्भीक और स्पष्टवादी चरित्र को रेखांकित करती है।
यह पुस्तक व्यवस्था के भीतर रहकर मेहनत, समर्पण और ईमानदारी के साथ काम करने की जटिलताओं और उनसे उबरने की कला को सादगी से साझा करती है।
लेखक का दक्षिण कोरिया यात्रा का अनुभव और वहां से सीखे गए प्रबंधन के सूत्र भारतीय व्यवस्था को आधुनिक बनाने की उनकी दूरदृष्टि का परिचय देते हैं।
व्यक्तिगत और पेशेवर जीवन के संतुलन को लेखक ने अपनी पत्नी डॉ. नीलम अस्थाना के सहयोग और समर्पण के माध्यम से सुंदर ढंग से व्यक्त किया है। वे स्वीकार करते हैं कि एक सफल जीवन के पीछे पारिवारिक संबल और विश्वास की कितनी बड़ी भूमिका होती है। सेवानिवृत्ति के बाद की उनकी ‘दूसरी पारी’ का विवरण, जिसमें ब्लॉगिंग, अध्यात्म और देश-विदेश की यात्राएं शामिल हैं, यह संदेश देता है कि सक्रियता और रचनात्मकता किसी उम्र की मोहताज नहीं होती।
अंततः, ‘स्मृतियों का वोल्टेज’ एक ऐसी रचना है जो प्रवाही भाषा और रोचक संस्मरणों के माध्यम से पाठकों को प्रेरित करती है। यह केवल एक व्यक्ति की विजय गाथा मात्र नहीं, बल्कि उन सभी ईमानदार अधिकारियों के संघर्षों का प्रतिनिधित्व करती है जिन्होंने सार्वजनिक सेवा में नैतिकता के उच्चतम मानक स्थापित किए। यह कृति युवा पीढ़ी, विशेषकर, उभरते हुए युवा इंजीनियरों के लिए एक ‘प्रकाश-स्तंभ’ की तरह है, जो उन्हें विपरीत परिस्थितियों में भी अपने मूल्यों पर अडिग रहने का हौसला प्रदान करती है।
इस लेखन के लिए मै व्यक्ति गत रूप से मेरे वरिष्ठ आदरणीय अस्थाना जी का अभिनंदन करता हूं। उनसे अब अन्य विभिन्न विधाओं में और भी किताबों की प्रतीक्षा रहेगी, क्योंकि उन्हें सोशल मीडिया पर नियमित पढ़ने मिल रहा है।
मंगल कामनाएं
चर्चाकार… विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार
ए २३३, ओल्ड मीनाल रेसीडेंसी, भोपाल, ४६२०२३, मो ७०००३७५७९८
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≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈






