श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका एक विचारणीय व्यंग्य  पान की दुकान पर मोदी – मेलोनी चर्चा

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # २८

☆ व्यंग्य ☆ “पान की दुकान पर मोदी – मेलोनी चर्चा” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

मैं रात्रि का भोजन करने के बाद पान खाने के मूड में टहलता हुआ झब्बूलाल की दुकान की ओर बढ़ रहा था। कुछ आगे बढ़ा तो झब्बू की दुकान का रेडियो साफ सुनाई देने लगा, “झुमका गिरा रे बरेली के बाजार में। ” मैंने सोचा कि आखिर बरेली की धरती में ऐसा क्या है कि वहां महिलाओं के सिर्फ झूमके ही गिरते हैं बेंदा, हार, करधन, पायल आदि गिरने की जानकारी कभी नहीं आई ! मुझे देखते ही झब्बू ने नमस्कार किया और मेरा पान तैयार करते हुए बोला – भाई साहब आपसे बहुत जरूरी काम है। मैंने कहा भाई जी अचानक क्या काम आ गया ? झब्बू बोला, आप मुझे और मेरे लगाए पान की क्वालिटी जानते ही हैं, मैंने कभी भी पान की गुणवत्ता और स्वाद से समझौता नहीं किया, सदा अपने ग्राहकों का हित सोचा, सबके साथ हमेशा मधुर व्यवहार किया। झब्बू जैसे ही सांस लेने रुका, मैंने बिना विलंब कहा, भाई मैं वर्षों से तुम्हें जानता हूं तुम मुझे यह सब क्यों बता रहे हो? मेरी बात को अनसुना करते हुए झब्बू ने बात आगे बढ़ाई बोला – भाई साहब आप वरिष्ठ पत्रकार हैं, साहित्यकार हैं, अनेक संस्थाओं से जुड़े हैं, बड़े – बड़े नेताओं से आपकी जान – पहचान है। मैंने कहा बस भाई बस। आखिर तुम्हें मुझसे ऐसा कौन सा काम आ गया है जिससे तुम मेरी इतनी तारीफ कर रहे हो !

 झब्बू लाल का दिया पान मैं अपने मुंह के हवाले करने ही वाला था कि उसकी बात सुनकर मेरा मुंह खुला रह गया। झब्बू ने कहा, भाई साहब मेरी इच्छा है कि जब भी अपने प्रधानमंत्री मोदी जी का जबलपुर आगमन हो तो वे मेरी दुकान पर आकर पान खाएं। इसके लिए मुझे आपकी मदद चाहिए। मेरे खुले मुंह के सामने हाथ में पान देखकर झब्बू बोला भैया क्या हुआ, मुंह खोले हो पान को तो अंदर भेजो। मैंने झटके से पान को मुंह में एक ओर खोंसते हुआ कहा, भाई कैसी असंभव सी बात कह रहे हो ! झब्बू ने तर्क रखा – जब मोदी जी कोलकाता में दुकान से खरीद कर झालमुड़ी खा सकते हैं तो मेरा पान क्यों नहीं खा सकते। मैंने कहा, प्यारे भाई जब उन्होंने झालमुड़ी खाई तब वहां चुनाव थे। यहां क्या है जो मोदी जी आकर तुम्हारा पान खायेंगे ? इससे उनको क्या फायदा ? झब्बू हंस कर बोला – भाई साहब पूरी दुनिया जानती है कि मोदी जी अपने फायदे के लिए कभी कुछ नहीं करते वो सिर्फ देश का फायदा सोचते हैं। मैंने कहा चलो ठीक है – अब यह बताओ कि यदि मोदी जी तुम्हारी दुकान पर आकर पान खा लें तो देश को क्या फायदा होगा ? झब्बू बोला भैया पान के शौकीन बढ़ेंगे तो पान का व्यापार बढ़ेगा, पान विक्रेता सम्पन्न होंगे। पान से जुड़ी सामग्री का उत्पादन बढ़ेगा, इससे जुड़ा रोजगार बढ़ेगा। मैं इस पर कोई टिप्पणी करता इससे पहले ही झब्बू बोला, भाई साहब मेरी समझ से तो यदि मोदी जी ने इटली की प्रधानमंत्री मेलोनी को मेलोडी चॉकलेट की जगह औषधीय गुणों से भरपूर मुख को शुद्ध और होंठों को लाल करने वाला अपने देश का पान खिलाया होता तो बात ही कुछ और होती। वो गाना है न “खई के पान बनारस वाला खुल जाए बंद अकाल का ताला”। मैं मेलोनी जी की अकल या बुद्धिमानी पर प्रश्न चिन्ह नहीं लगा रहा लेकिन बुद्धि तो जितनी बढ़े उतना ही अच्छा। मैं झब्बू की बात पर हँसा उसने फौरन बात सम्हाली और बोला, भाई साहब मेलोनी को पान खिलाना व्यापारिक दृष्टिकोण से भी अपने देश के लिए अधिक लाभ दायक होता। जरा सोचें कि यदि पूरी दुनिया पान खाने लगे तो पान और उससे संबंधित सामग्री का हमें कितना निर्यात और उत्पादन करना पड़ेगा। मैंने कहा झब्बू वह सब ठीक है लेकिन देखते नहीं कि हमारे देश के ऑफिसों – अस्पतालों सहित कितनी महत्वपूर्ण इमारतों के कोने, सीढ़ियां, सड़कें, बगीचे पान की पीक से गंदे और बदबूदार हो गए हैं। क्या तुम चाहते हो कि सारी दुनिया की हालत ऐसी हो जाए ? मेरी बात सुनकर झब्बू बेशर्मी से हंसते हुए बोला भैया जब पूरी दुनिया ही पान की पीक से भर जाएगी तब हमारे पीकों वाले देश पर कौन उंगली उठाएगा ? झब्बू से बच कर निकलने का एक ही उपाय था उसकी हां में हां मिलना। मैंने कहा प्यारे भाई मैं प्रयास करूंगा कि मोदी जी आपकी दुकान पर पान खाने आयें और अबकी बार इटली जाने के पहले पानों की कुछ पुड़ियां मेलोनी जी के लिए भी ले जाएं। मैं आगे बढ़ने लगा तो झब्बू ने रिश्वत रूपी एक मीठा पान मुझे भेंट करते हुए कहा कि ये मेरी भाभी जी को खिलाइए।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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