डॉ निशा अग्रवाल

☆ कविता ☆ “कलम मेरी” ☆ डॉ निशा अग्रवाल

मैं कागज़ की श्वेत धरा बनूँ,

तुम स्याही की धार बन जाना,

मैं सपनों की रेखा खींचूँ,

तुम उनका विस्तार बन जाना।

 *

मैं मन के भाव सजाऊँ जब,

तुम अक्षर-अक्षर खिल जाना,

मेरी हर मौन पुकारों में,

तुम स्वर बनकर मिल जाना।

 *

मैं शब्दों का सागर बनूँ,

तुम लहरों की तान बन जाना,

मैं रचना की राह दिखाऊँ,

तुम उसका सम्मान बन जाना।

 *

जब थक जाए ये कलम मेरी,

तुम ऊर्जा बन बह जाना,

मैं कागज़ का रूप धारण करूँ,

तुम मुझमें जीवन भर जाना।

©  डॉ निशा अग्रवाल

शिक्षाविद एवं पाठयपुस्तक लेखिका 

जयपुर, राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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Nisha Agrawal

हार्दिक आभार आपका आदरणीय जी