सुश्री मंजिरी “निधि”
(बड़ोदा से सुश्री मंजिरी “निधि” जी की गद्य एवं छंद विधा में विशेष अभिरुचि है और वे साथ ही एक सफल महिला उद्यमी भी हैं। आज प्रस्तुत है ‘मंजिरी की कुण्डलियाँ ‘।)
☆ मंजिरी साहित्य # ११ ☆
कविता – मंजिरी की कुण्डलियाँ – सन्देश ☆ सुश्री मंजिरी “निधि”
-1-
द्वारे मेरे प्रभु चलो, क्यों करते अवलम्ब l
राह आपकी मैं तकूँ, कर में लिये प्रलम्ब ll
कर में लिये प्रलम्ब, भरत आये अब मिलने l
राज पाट सब छोड़, मना कर लाऊं धर में ll
ले कर ये सन्देश, कहें चल संग हमारे l
सभी तके हैं राह, चलो प्रभु अब तो द्वारे ll
-2-
गाते गाथा वह चला, माधव का संदेश l
आया जब उद्धव लिये, बृज में किया प्रवेश ll
बृज में किया प्रवेश, देख ही झपटे सारे l
क्या कहता है कृष्ण, बात करते हैं न्यारे ll
समझा उद्धव आज, प्रेम की सारी बातें l
नमन हुआ हैं माथ, चला वह गाथा गाते ll
-3-
आता जन को तब समझ, करता पल जब चूर l
तूफानों में सब बड़े, हो जाते हैं दूर ll
हो जाते हैं दूर, सभी ने हैं यह माना l
समय दिया संदेश, भूल मत मुझको जाना ll
बोले पैसा आज, दम्भ सर पर चढ़ जाता l
हो जाता कंगाल, समझ तब जन को आता ll
☆
© सुश्री मंजिरी “निधि”
बड़ोदा, गुजरात
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





