सुश्री सविता खण्डेलवाल ‘भानु’

(लेखन-प्रकाशन – गत 2022 से छंद लेखन, एकल प्रकाशन– कलम के नवांकुर, अनुग्रह नवप्रस्तारित छंद पर लेखन (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), साझा संकलन – तकरीबन 10, द्वादश ज्योतिर्लिंग (लंदन बुक आफ रिकार्ड), अनेकता में एकता (एशिया बुक ऑफ वर्ल्ड रिकॉर्ड), छंदावली – (मैजिक बुक ऑफ रिकॉर्ड), महाकाल साहित्य सम्मान से सम्मानित। आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता !!पिता!!)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ ☆ सविता साहित्य # ६ ☆

☆ !!पिता!! ☆ सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु” ☆

लेखनी बोलती अपना मन खोलती, क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।।

*

जिनकी क्षमताएंँ ऊंँची हो आकाश से,  मन में सपने सजाते तुम्हारे लिए ।

देखना चाहते खुद से उत्तम तुम्हें , करते हैं सब समर्पित तुम्हारे लिए ।‌‌।

शब्द भी श्रेष्ठ से सदा खोजती,  क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।

लेखनी बोलती अपना मन खोलती, क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।।

*

मन में गहराई रखकर वे पाताल सी,  दर्द दुनियाँ के तुमसे छुपाते सदा ।

असीमित प्रेम करते हैं संतान से, रौब बातों में अपनी दिखाते सदा ।।

रौब से झांँकता उनका डर टोहती, क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।।

लेखनी बोलती अपना मन खोलती, क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।।

*

उनका साया हिमालय सा दे हौसला,  वो कहें धैर्य खोना न चलते रहो ।

हर कदम पर खड़ा हूंँ मैं परछाई सा, पीछे देखो नहीं आगे बढ़ते रहो ।।

पिता तुल्य पाया न रिश्ता कोई, जग के रिश्तों को जब-जब भी मैं तोलती ।

लेखनी बोलती अपना मन खोलती,  क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।।

लेखनी बोलती अपना मन खोलती, क्या लिखूंँ पिता पर यही सोचती ।।

© सुश्री सविता खण्डेलवाल “भानु”

झालरापाटन राजस्थान

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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