श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है सामाजिक विमर्श पर आधारित विचारणीय लघुकथा “बाल मजदूर (कलूवा)”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २६८ ☆
🌻लघु कथा🌻 🪔 बाल मजदूर (कलूवा) 🪔
मिट्टी के दिये बनाये जा रहे थे। लगभग पचास मजदूरों का समुह काम कर रहा था। अपनी माँ के साथ नन्हा कलूवा जो अभी सिर्फ दस वर्ष का हुआ था। आज अपनी माँ के साथ जिद्द से दिये बनाने आ गया था।
ठेकेदार देखते ही बोला— “इसे लेकर आई हो काम क्या करोगी?”
“नही साहेब सब कर लूंगी ये चुपचाप बैठा रहेगा।”
“चल तू भी दिये बना। यदि बना लिया तो नगद राशि भी दूंगा और सबके कपड़ों के साथ महिने भर का राशन भी दूंगा।”
कलूवा मिट्टी ले नन्हें नन्हें हाथों से दिये बनाने लगा। देखते- देखते दिये की ढेरी लगा दिया।
आसपास के सभी मजदूर कहने लगे – “भगवान ही हमें हिम्मत ताकत देता है। आज कलूवा की माँ को नई साड़ी मिल जायेगी। बरसों से तरस गई थी।”
“कलूवा जैसा दीपक होने के बाद हमारे घर तो उजाला ही होगा।”
ठेकेदार ने मिट्टी से सने नन्हें कलूवा को ह्रदय से लगा लिया।
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© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈




