डॉ कुंदन सिंह परिहार

(वरिष्ठतम साहित्यकार आदरणीय  डॉ  कुन्दन सिंह परिहार जी  का साहित्य विशेषकर व्यंग्य  एवं  लघुकथाएं  ई-अभिव्यक्ति  के माध्यम से काफी  पढ़ी  एवं  सराही जाती रही हैं।   हम  प्रति रविवार  उनके साप्ताहिक स्तम्भ – “परिहार जी का साहित्यिक संसार” शीर्षक  के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुंचाते  रहते हैं।  डॉ कुंदन सिंह परिहार जी  की रचनाओं के पात्र  हमें हमारे आसपास ही दिख जाते हैं। कुछ पात्र तो अक्सर हमारे आसपास या गली मोहल्ले में ही नज़र आ जाते हैं।  उन पात्रों की वाक्पटुता और उनके हावभाव को डॉ परिहार जी उन्हीं की बोलचाल  की भाषा का प्रयोग करते हुए अपना साहित्यिक संसार रच डालते हैं।आज प्रस्तुत है आपकी एक अप्रतिम व्यंग्य – ‘टेढ़े-मेढ़े रास्ते‘। इस अतिसुन्दर रचना के लिए डॉ परिहार जी की लेखनी को सादर नमन।)

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – परिहार जी का साहित्यिक संसार  # ३३९ ☆

☆ व्यंग्य ☆ टेढ़े-मेढ़े रास्ते ☆ डॉ कुंदन सिंह परिहार ☆

गोस्वामी जी ऑफिस के बड़े बाबू के पास पहुंचे। कहा, ‘बड़े बाबू, वाइफ का ट्रांसफर कराना है। छः साल से सीतापुर में पड़ी हैं। परेशानी बनी हुई है।’

बड़े बाबू सुंघनी का एक डोज़ लेकर बोले, ‘हो जाएगा। हम किस दिन काम आएंगे?’

गोस्वामी जी ने पूछा, ‘कुछ चंदन-पानी लगेगा क्या?’

बड़े बाबू ने जवाब दिया, ‘तीन लाख का रेट चल रहा है। ले आओ और हफ्ते भर में आर्डर ले लो।’

गोस्वामी जी की आंखें फैल गयीं, बोले, ‘तीन लाख? यह तो बहुत है। इतना कौन देगा?’

बड़े बाबू इत्मीनान से फाइल पलटते हुए बोले, ‘देख लो। हमने सीधा रास्ता बता दिया। काम बिलकुल सही और ईमानदारी से होगा। हफ्ते भर में आर्डर मिल जाएगा।’

गोस्वामी जी हाथ उठाकर बोले, ‘न बाबा! यह तो बहुत ज्यादा है। मेरी मंत्री जी के पीए से रसाई है। मेरी कॉलोनी में ही रहते हैं। उनसे कहूंगा। वह ज़रुर मदद करेंगे।’

बड़े बाबू बोले, ‘देख लो। हमने तो आपको सीधा-सादा रास्ता बता दिया, एकदम एक्सप्रेस वे वाला। आपको टेढ़े-मेढ़े रास्ते पसंद हैं तो उन्हीं को पकड़ो। आपकी मर्जी।’

गोस्वामी जी पंद्रह दिन बाद फिर आकर बड़े बाबू के पास बैठ गये। मायूसी के स्वर में बोले, ‘हमें पीए साहब ने आश्वासन दिया था, लेकिन कुछ नहीं हुआ। सब झटका देते हैं। कोई भरोसे के लायक नहीं है। अब तो ट्रांसफर बंद भी हो गये ।’

बड़े बाबू ने जवाब दिया, ‘हमने तो आपको पहले ही सलाह दी थी कि सीधे रास्ते पर चलो, लेकिन आपको टेढ़े-मेढ़े रास्ते ही पसंद हैं तो हम क्या कर सकते हैं? जमाने के हिसाब से नहीं चलोगे तो तकलीफ तो उठानी पड़ेगी।’

—–

© डॉ कुंदन सिंह परिहार

जबलपुर, मध्य प्रदेश

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

0 Comments
Oldest
Newest Most Voted