श्री ओमप्रकाश पाण्डेय

(वरिष्ठ साहित्यकार श्री ओमप्रकाश पाण्डेय जी भारतीय स्टेट बैंक से 2015 में सहायक महाप्रबंधक के पद से सेवानिवृत्त.  सन 2018 से कविताओं और लघु कथाओं का नियमित रूप से लेखन. दो काव्य संग्रह “ऑंचल” और “किलकारियाँ (बालगीत संग्रह)” तथा दो कथा संग्रह “चूड़ियाँ” और “अनपढ़” प्रकाशित. लगभग तीन सौ से अधिक कहानियाँ व लघु कथाएं रचित जिनमें “मार्निंग वाक” (दस कहानियाँ), “आधुनिक विक्रम और वेताल की कथा” (दस कहानियाँ), दीदी, प्रश्न या आमंत्रण, सोंकविता , विश्वास आदि चर्चित रहीं हैं. आपके द्वारा सात सौ से अधिक कविताएँ रचित जो कई साहित्यक मंचों पर प्रस्तुत की गईं हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय कथा “दस रुपए के नोट की आत्मव्यथा“.)

 ☆ कथा कहानी ☆ दस रुपए के नोट की आत्मव्यथा ☆ श्री ओमप्रकाश पाण्डेय ☆

आप लोग महान व्यक्तियों की आत्मकथा पढ़ते होंगे , और उनकी आत्मकथा से प्रेरणा भी लेते होंगे. मेरे जीवन में ऐसा कुछ है नहीं. मैं तो मात्र लेन -देन का एक माध्यम हूॅं. मैं जिसकी जेब में रहता हूॅं, वह बहुत खुश रहता है. फिर लोग समझते होंगे कि मैं भी सदा खुश रहता हूॅं, पर यह पूरा सत्य नहीं है, बल्कि अधूरा सत्य है . आइये मैं आपको अपनी आत्मव्यथा बताऊॅं .

भारत सरकार के नोट छापने के प्रेस में मेरा जन्म हुआ. जन्म भी संगीनों के साये में हुआ और ऐसी जगह हुआ जहाॅं  परिंदे भी पर नहीं मार सकते थे. जो भी कर्मचारी अथवा अधिकारी अन्दर आता  था, उसकी पूरी तलाशी ली जाती थी, यहाॅं तक कि उनके  जूते और मोज़े भी उतरवा कर चेक किया जाता था. मैं एकदम कड़क और खूबसूरत था. मुझे मेरे अन्य निन्नानबे भाईयों के साथ मिलाकर एक सौ की गड्डी बनायी गई. मेरी तरह बहुत सारे नोटों की गड्डियों को मिला कर बंडल बनाया गया. हम सारे नोटों को देश के विभिन्न बैंकों में,  एक  लकड़ी के  बक्से में बंद कर के, कड़ी सुरक्षा में पहुंचा दिया गया.  अब यहाॅं से मेरी वास्तविक जीवन यात्रा शुरू होती है.

एक दिन मुझे बैंक के कैशियर को दे दिया गया, और वहाॅं पर बैंक से मुझे एक व्यक्ति,  जिसने बहुत सारे रुपए निकाले थे, उसे अन्य नोटों के साथ ( जिसमें  पांच सौ, सौ, पचास,बीस , दस आदि के नोट भी थे ) मुझे भी दे दिया गया. अब मैं बैंक से, उस व्यक्ति के पर्स में पहुंच चुका था. मैं मुड़ा हुआ,  चुपचाप उसके पर्स में पड़ा हुआ था. बैंक से बाहर आने के बाद उस व्यक्ति ने रामआसरे के पान की दूकान पर पान खाया और उसे मुझे दे दिया. रामआसरे ने भी पान के पांच रुपए काट कर, बाकी पांच रुपए उसे वापस कर दिया और उसने मुझे अपने पैरों के पास में रखे हुए  एक डिब्बे में रख दिया. मैं अन्य नोटों के साथ उसी डिब्बे में पड़ा हुआ था.

शाम को रामआसरे ने डिब्बे से कुछ नोट निकाले, जिसमें मैं भी एक था, और अपने जेब में रख कर, अच्छे कपड़े पहन कर, अपने दोस्त कल्लू के बेटे की शादी में चल दिया. थोड़ी देर बाद, रात हो चुका था और मेरे कानों में  बैंड बाजा की आवाज और लोगों के नाचने की आवाज सुनाई पड़ी और ” आज मेरे यार की शादी है” गाना सुनाई पड़ने लगा. रामआसरे यह गाना सुन कर इतना खुश हुआ कि वह खुद भी नाचने लगा. अचानक नाचते – नाचते उसने जेब में रखे हुए नोटों को अपने हाथ में लेकर लहराने लगा, लहराते हुए नोटों में मैं भी एक था. लहराते- लहराते उसने हाथ के सारे नोटों को  हवा में उछाल दिया. सारे बैंड वाले, बजाना बन्द कर के हमें बटोरने लगे. इस आपाधापी में कितनों के जूतों के नीचे मैं कुचला गया, मुझे याद नहीं. जीवन में पहली बार मुझे बुरी तरह से जूते से कुचला गया. खैर, थोड़ी ही देर में, एक बैंड वाले के हाथ मैं लग गई और उसने मुझे अपनी जेब में जल्दी से रख लिया. दर्द से मैं कराह रही थी, लेकिन वहाॅं मेरी चीखें कौन सुनता! खैर कुछ देर उसकी जेब में पड़े रहने के बाद,मेरा दर्द कुछ कम हुआ .

उस बैंड वाले व्यक्ति ने बारात के बाद घर आकर सारे नोट अपनी पत्नी अर्चना  को दे दिया, और उसने सहेज कर अपने पर्स में हम सबको रख लिया. अब तक आधी रात बीत चुकी  थी . घर के सब लोग सो चुके थे, हम सारे नोट भी पर्स में आराम से पड़े हुए थे. सुबह होते ही अर्चना के बेटे गजेन्द्र ने कहा मम्मी मुझे दस रुपए दे दो, आज मंगलवार है, हनुमानजी को मैं प्रसाद चढ़ाऊंगा. अर्चना ने पर्स से मुझे निकाल कर गजेन्द्र को दे दिया. गजेन्द्र ने हनुमानजी के मंदिर के पास के चौधरी के दूकान से बतासा खरीद कर, हनुमानजी को चढ़ा दिया. चौधरी ने अभी मुझे अपने गल्ले में रखा ही था कि एक भीखमंगा आ गया और उससे भगवान के नाम पर कुछ मांगने लगा. चौधरी ने मुझे उठा कर उसे दे दिया और बोला कि एक रुपया रख लो और नौ रुपया वापस करो. अब मैं भिखमंगा बटौहा के झोले में पहुंच गया. दिन भर भीख मांगने के बाद शाम को बटौहा ने एक दूकान से कुछ चावल – दाल खरीदा और सब्जी मंडी से कुछ सब्जी. अब मैं सब्जी बेचने वाली लक्षमिनिया के पैरों के नीचे, जिस बोरे  पर वह बैठी थी, उसके भीतर मैं पहुंच गया. भीषण बदबू हो रही थी, ऊपर से लक्षमिनिया मेरे ऊपर बैठी थी, और मैं अन्य नोटों के साथ दबा हुआ था. लक्षमिनिया ने रात में पता नहीं क्या खाया था, वह थोड़ी- थोड़ी देर के बाद बदबूदार हवा  छोड़ती रहती और हम सब नोटों की हालत नारकीय हो रही थी.

इस प्रकार से हमारी यात्रा चलती रही, कहने को तो मेरा एक बहुत ही लम्बा जीवन है, लेकिन मैं अपने जीवन के अन्तिम समय के पहले की कुछ मर्मांतक घटनाओं को कह कर, मैं अपनी कहानी समाप्त कर दूंगा.

एक दिन मुझे एक आदमी ने किशोर आटो चालक को दे दिया. दिन भर किशोर आटो चलाने के बाद रात में मयूरी डांस बार पहुंचा. उसकी वहां पर पसंद की डांस गर्ल थी बिंदिया. बिंदिया बिल्कुल बिंदास थी. उसके लिए दोस्ती अपनी जगह, धंधा अपनी जगह. धंधे में बिंदिया कोई लफड़ा नहीं मांगती थी. खैर उस रात किशोर के साथ उसने काफी समय बिताया, चलते समय किशोर ने उसके हाथ में कुछ नोट रख दिए. बिंदिया ने नोटों को गिना. कुल नोट थे, चार सौ दस! अब बिंदिया क्रोध से चिल्लाने लगी, किशोर को संसार की जितनी भी भद्दी गालियां हो सकती थी, उसने दिया. किशोर ने कहा बिंदिया रानी, आज कमाई कम हुई है, रख लें, रोज़ तो तुम्हारे लायक देता ही हूॅं. बिंदिया भड़क गई, बोली देख, लूंगी तो पूरा लूंगी, नहीं तो यह अपना रुपया रख, मैं ऐसे रुपए पर थूकती हूं. इतना कहकर बिंदिया ने मुझ पर थूक दिया. जिंदगी में पहली बार मुझे यह भी दिन देखना पड़ा. किशोर एकदम भड़क गया, पहले तो उसने हम नोटों को उठाकर अपने रुमाल से पोंछा और अपने जेब में रखा, उसके बाद उसने जो बिंदिया को गाली देना शुरू किया कि पूछो मत. फिर उसने बिंदिया को कहा कि आज तूने दौलत के नशे में लक्ष्मी पर थूका है ( हम नोटों को कुछ लोग लक्ष्मी भी कहते हैं, और प्रणाम करते हैं), जा मैं तुम्हें श्राप देता हूं कि तुमको कोढ़ हो जायेगा.

किशोर फिर बार से बाहर आया और सीधे एक देशी दारु की दुकान पर गया. दुकान के सामने एक औरत जिसका  नाम सुरजिया था और उसने चिकने की दूकान जमीन पर लगा रखी थी, जहां वह भूजी हुई मछली, उबले हुए अंडे आदि बेचती थी और लोग दारु पीने के पहले उसकी दूकान से चिकना खाते थे. किशोर ने भी भूजी हुई मछली खरीदी और अन्य नोटों के साथ मुझे  सुरजिया को दे दिया. सुरजिया  ने हमें अपने पैरों के नीचे रखें बोरे में घुसा  दिया. अब मैं उसके पैरों के नीचे, जहाॅं  कच्ची दारु की बदबू आ रही थी, दबा था. लेकिन मेरे पास कोई चारा नहीं था सिवाय वहीं पड़े रहने के. ग्राहक आते, चिकना लेते और फिर भट्टे पर दारू पीने चले जाते. आधी रात के बाद सुरजिया ने अपनी दूकान समेटी और दारु की दूकान पर जा कर एक पौआ दारु पिया और कुछ नोटों के साथ मुझे भी भट्टे वाले को दे दिया. भट्टे वाले ने बिना गिने मुझे अपने गल्ले में रख दिया. चारों ओर कच्ची दारु की बदबू फैली थी और उसी में मैं पड़ा हुआ था.

सुबह हुआ और एक आदमी ने हम सारे नोटों को एक बोरे में रखा और बाजार में जा कर एक बैंक में , वहां के एक कैशियर को दे दिया. कैशियर ने कहा क्या तुम गंदे नोट ले आते हो, मुझे साहब से डांट खाना पड़ता है. उस आदमी ने हंसते हुए कहा साहब हमारे पास तो ऐसे नोट और ऐसे ही लोग आते हैं, मैं साफ नोट कहां से लाऊॅं ! फिर उस आदमी ने अपने दूसरे झोले से एक शैम्पेन की बोतल निकाली और कैशियर को देते हुए बोला साहब यह आप के लिए है. कैशियर ने कहा इसकी क्या जरूरत थी!  उस आदमी ने कहा नहीं साहब जरुरत क्यों नहीं है, आप लोग भी बड़ी मेहनत करते हैं. और इस प्रकार से मैं बैंक में पुनः पहुंच गया. शाम को हेड कैशियर ने कहा कि साफ नोट और गन्दे नोट अलग-अलग कर दो और जो गन्दे नोट हैं,  उन्हें non – issuable नोटों की आलमारी में रख दो, जिससे कि उन्हें  दुबारा ग्राहकों को नहीं दिया जाय.

दूसरे दिन मेरी तरह न जाने कितने गन्दे नोट एक अलग आलमारी में बंद कर दिए गए. कितने समय उस आलमारी में मैं पड़ा रहा, मुझे पता नहीं, लेकिन एक दिन हम सारे गन्दे नोटों को बक्से में बंद कर, भारतीय रिजर्व बैंक भेज दिया गया. वहां भी हम , सालों बक्से में बंद पड़े रहे  और एक दिन हम सबको बाहर निकाल कर, मशीन से छोटे – छोटे टुकड़े कर के, एक बड़े से बिजली के ओवन में, भारतीय रिजर्व बैंक के बड़े साहबों के उपस्थित में , हमें सामूहिक जला दिया गया और इस प्रकार से मेरी जीवन यात्रा समाप्त हो गई.

© श्री ओमप्रकाश पाण्डेय 

14.06.2026

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संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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