श्री घनश्याम अग्रवाल

☆ लघुकथा ☆ के, मैं जिन्दा हूँ अभी – “बाप होने का मज़ा” 😁 ☆ श्री घनश्याम अग्रवाल

(आज पिता दिवस पर एक लघुकथा )

शहर के फुटपाथ से लगे बिजली के खम्भे अपनी पीली रोशनी से सारे शहर को चमकातेथे, किन्तु उन्ही खम्भों के नीचे खड़े भिखारियों की खुली हथेलियों पर अंधेरा ही रहता। उनकी हथेलियाँ तो तभी चमकतीं जब कोई दाता उन पर  छोटे या बड़े  पैसों का सिक्का रख देता। तब, ये हथेलियाँ सिक्कों के अनुपात में 25, 40 या 100 पाॅवर के बल्ब के समान चमक उठती। ऐसी ही एक हथेली का नाम रमदू था। यह नाम उसे कब, किसने और कैसे दिया, कोई नहीं जानता। स्वंय रमदू भी नहीं। बचपन से लेकर आज तक इसी खम्भे के नीचे खड़े होकर भीख माँगते-माँगते उसे साठ वर्ष हो गए।

कुछ महीनों से वह सुबह दस बजे और शाम पाँच बजे एक-एक घण्टे के लिए चौराहे पर चला जाता। इस समय चौराहे पर ट्रैफिक जाम रहता। पाँच-पाँच मिनट तक हरा सिग्नल नहीं होता। कारों की लाइनें लग जाती। रमदू इन्हीं कारों के शीशे में अपनी हथेली फैला देता। उसकी अनुभवी आँखें कार व कार मालिकों को पहचानने लगी थीं। अतः उसकी हथेली प्रायः खुली नहीं आती थी। जब ट्रेफिक कम हो जाता, वह अपने खम्भे के पास आ जाता। यदि वहाँ कोई दूसरा भिखारी खड़ा होता तो वह चीख-चीखकर, गालियाँ देकर उसे भगा देता। अक्सर भिखारी उसे देखते ही उसका खम्मा छोड़ देते।

उस दिन भी रमदू ने रुकी हुई कारों में से एक कार में अपनी हथेली फैला दी। क्षणभर के बाद ही उसे लगा कि आज उसने गलत कार चुनी है। इस कार ने कई बार उसे निराश लौटाया है। सेठ बुलाकीदास बड़े कंजूस और चिड़चिड़े व्यक्ति थे।

रमदू अपनी हथेली खींच ही रहा था कि सेठ बुलाकीदास ने उसं रुकने का संकेत दिया और मुस्कुराते हुए अपनी जेब से एक सौ रुपये का नोट निकालकर उसकी हथेली पर रख दिया। रमदू ने अपनी लम्बी जिन्दगी में सिर्फ़ सुना भर था कि सौ का नोट कारवालों के पास होता है। आज वह न केवल उसे इतने करीब से देख रहा था, बल्कि उसकी गर्म छुअन भी महसूस कर रहा था। एक अजीब से स्वप्न की तरह कभी सेठ को और कभी नोट को देख रहा था। सेठ ने मुसकुराते हुए कहा- “डरो नहीँ बाबा, रख लो। असली है। जाओ मौज करो। आज मैं पहली बार इस उम्र में बाप बना हूँ। अभी-अभी अस्पताल से खबर आई है कि मेरी पत्नी ने एक बेटे को जन्म दिया है। वहीं जा रहा हूँ। बच्चे के लिए दुआ करो बाबा। जाओ मौज करो।”

बुढ़ापे में बाप बनने की कितनी खुशी होती है कि आदमी यह भी भूल जाता है कि वह अपनी खुशी किसके सामने व्यक्त कर रहा है। रमदू ने नोट को अपनी मुट्ठी में कैद कर बन्द मुट्ठी से ही सेठ को हाथ जोड़े। सिग्नल हरा हो गया। रमदू ने सेठ पर दुआ भरी नजर डाल अपना हाथ खींच लिया। कारों के समान रमदू भी सरकते-सरकते सड़क पार की। वह तेजी से अपने खम्भे की ओर बढ़ने लगा। उसका चेहरा मारे खुशी के सेठ बुलाकीदास के चेहरे की तरह चमकने लगा। उसकी मुट्ठी में सौ का नोट है,  उसकी चाल में एक सेठपन आ गया ।

उसने देखा कि उसके खम्भे के नीचे एक मरियल-सा भिखारी खड़ा है। पर आज उसके चेहरे पर गुर्राहट की जगह। मुस्कुराहट खेल रही थी। वह दबे पाँव उस भिखारी के पीछे खड़ा हो गया। उसने अपनी जेब से एक सिक्का निकाला और पीछे से उस भिखारी की खुली हथेली पर रख दिया। मरियल-से भिखारी ने चौंककर देखा तो वह काँपने लगा। रमदू मुस्कुरा रहा था। उसे मुस्कुराते देखकर वह भय और आश्चर्य से कभी सिक्के को, तो कभी रमदू को देख रहा था। गाली के बजाय रमदू से सिक्का जो मिला। रमदू ने हँसते हुए कहा- “डरो नहीं, आज दिनभर यहीं डटे रहो। तुम भी मौज करो। अपुन आज इस उम्र में पहली बार बाप बना है।” यह कह वह जेब में रखे सौ के नोट को यूँ थपथपाने लगा, मानो वह सौ का नोट नहीं, एक नन्हा-सा शिशु हो।

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© श्री घनश्याम अग्रवाल

(हास्य-व्यंग्य कवि)

मो 94228 60199

 संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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