डॉ.राजेश ठाकुर
( प्रो डॉ राजेश ठाकुर जी का मंतव्य उनके ही शब्दों में – “पाखण्ड, अंध विश्वास, कुरीति, विद्रूपता, विसंगति, विडंबना, अराजकता, भ्रष्टाचार के खिलाफ़ जन-समुदाय को जागृत करना ही मेरी लेखनी का मूल प्रयोजन है…l” अब आप प्रत्येक शनिवार डॉ राजेश ठाकुर जी की रचनाएँ आत्मसात कर सकते हैं. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण रचना “चम्पत…“.)
साप्ताहिक स्तम्भ ☆ कविता # ३७
कविता – चम्पत… ☆ प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
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हुए चोर चम्पत, लेकर चढ़ावा राम जी
श्रद्धा-भक्ति को मिले कैसे बढ़ावा राम जी
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स्वार्थ के हर दौर में निर्दोष ही ठगे गये
सह रहे वे आज भी देखो छलावा राम जी
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धर्म की प्रतिष्ठा को घेरा है भ्रष्टाचार ने
भक्तों के हिस्से तो आया बस रुलावा राम जी
=4=
मंदिर-मस्जिद-तीर्थ सब व्यापार का अड्डा बने
और क्या होगा बुरा इसके अलावा राम जी
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महँगाई के तीरों से मूर्छित जन पुकारते
भेजिए हनुमत को फिर से बुलावा राम जी
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हम भी अपने मन की बात कहना चाहते प्रभु
अच्छे दिन का दे रहे क्यों भुलावा राम जी
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धर्म के प्रतीक सारे आपसे समृद्ध हैं
बदनाम ना हो तिलक, जनेऊ ,कलावा राम जी
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मतदान की क़तार में जनमत खड़ा रहा
इ.वी.एम. दे गई फ़िर से झुलावा राम जी
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प्रश्नपत्र लीक क्यों,खिलवाड़ क्यों भविष्य से
ख़ून खौलकर ये न बन जाए लावा राम जी
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घर में हैं माँ-बाप तो फ़िर तीर्थ क्या जाना सखे
घर में ही रब,यीशु और काशी कावा राम जी
=11=
‘राजेश’ द्वेष-छल-कपट ने रोके सारे रास्ते
पाखण्डवादी कर रहे भक्ति का दावा राम जी
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© प्रो. डॉ. राजेश ठाकुर
शासकीय कॉलेज़ केवलारी
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