श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

वरिष्ठ पत्रकार, लेखक श्री प्रतुल श्रीवास्तव, भाषा विज्ञान एवं बुन्देली लोक साहित्य के मूर्धन्य विद्वान, शिक्षाविद् स्व.डॉ.पूरनचंद श्रीवास्तव के यशस्वी पुत्र हैं। हिंदी साहित्य एवं पत्रकारिता के क्षेत्र में प्रतुल श्रीवास्तव का नाम जाना पहचाना है। इन्होंने दैनिक हितवाद, ज्ञानयुग प्रभात, नवभारत, देशबंधु, स्वतंत्रमत, हरिभूमि एवं पीपुल्स समाचार पत्रों के संपादकीय विभाग में महत्वपूर्ण दायित्वों का निर्वहन किया। साहित्यिक पत्रिका “अनुमेहा” के प्रधान संपादक के रूप में इन्होंने उसे हिंदी साहित्य जगत में विशिष्ट पहचान दी। आपके सैकड़ों लेख एवं व्यंग्य देश की विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुके हैं। आपके द्वारा रचित अनेक देवी स्तुतियाँ एवं प्रेम गीत भी चर्चित हैं। नागपुर, भोपाल एवं जबलपुर आकाशवाणी ने विभिन्न विषयों पर आपकी दर्जनों वार्ताओं का प्रसारण किया। प्रतुल जी ने भगवान रजनीश ‘ओशो’ एवं महर्षि महेश योगी सहित अनेक विभूतियों एवं समस्याओं पर डाक्यूमेंट्री फिल्मों का निर्माण भी किया। आपकी सहज-सरल चुटीली शैली पाठकों को उनकी रचनाएं एक ही बैठक में पढ़ने के लिए बाध्य करती हैं।

प्रकाशित पुस्तकें –ο यादों का मायाजाल ο अलसेट (हास्य-व्यंग्य) ο आखिरी कोना (हास्य-व्यंग्य) ο तिरछी नज़र (हास्य-व्यंग्य) ο मौन

आज प्रस्तुत है आपका समसामयिक विषय पर एक विचारणीय व्यंग्य  रामचंद्र कह गए सिया से…

साप्ताहिक स्तम्भ ☆ प्रतुल साहित्य # ३१ ☆

☆ व्यंग्य ☆ “रामचंद्र कह गए सिया से…” ☆ श्री प्रतुल श्रीवास्तव

वर्षों पहले एक फिल्म आई थी गोपी जिसमें दिलीप कुमार पर फिल्माया गया एक गाना बहुत चर्चित हुआ था।

“रामचंद्र कह गए सिया से ऐसा कलयुग आएगा,

हँस चुनेगा दाना जुन का कौवा मोती खाएगा।”

अयोध्या के राम मंदिर में श्रद्धालुओं द्वारा दिये गए दान के पैसों और आभूषणों की चोरी ने इस वर्षों पुराने गीत को सही साबित कर दिया। गीत लंबा है और इसमें जितनी भी बातें कही गई हैं वे सभी सच साबित हो रहीं हैं। राम मंदिर में चोरी की चर्चा न सिर्फ भारत वरन पूरी दुनिया में हो रही है। दान की चोरी करने वालों को श्रद्धालु और तमाम ईमानदार लोग तो धिक्कार ही रहे हैं, ईश्वर पर आस्था रखने वाले सिद्धांतवादी चोर, डाकू, लुटेरे, रिश्वतखोर, जमाखोर भी मंदिर के दान और चढ़ोत्तरी पर हाथ साफ करने वालों की निंदा कर रहे हैं। लोग कह रहे हैं कि मंदिर में दान राशि – संग्रह के लिए बनाए गए नियमों का सख्ती से पालन नहीं हुआ। वैसे देखा गया है कि तमाम नियमों कानूनों के बाद भी देश में अरबों के घोटालों, चोरियों, धोखाधड़ी से लेकर प्रश्न पत्रों व अन्य महत्वपूर्ण दस्तावेजों की चोरी का लम्बे इतिहास के साथ – साथ वर्तमान भी है।

चोर, चौकीदार से शातिर होते हैं। वे लोगों की आंखों के काजल से लेकर दिल तक चुरा लेते हैं और पता चोरी होने के बाद ही चल पाचौड़ाता है। इसलिए तो कहा गया है कि डाल – डाल चलने वाले चौकीदारों की अपेक्षा पात – पात चलने वाले चोर हमेशा सफलता प्राप्त कर लेते हैं। यह ठीक है कि चोरी बुरी बात है पर चोर होना कोई मामूली बात नहीं। चोरी के लिए 56 इंच का सीना होना चाहिए ये तो मैं नहीं कहूंगा क्योंकि इस नाप का सीना निर्विवाद है, लेकिन विशाल सीना होना आवश्यक है। प्राचीन भारतीय ग्रंथों विशेषकर संस्कृत साहित्य जैसे “दशकुमारचरितम्” में चोरी को चतुषष्टिक कलाओं में से एक विशेष विद्या “चौर्य कला” के रूप में उल्लेखित किया गया है। अर्थात चोरी एक कला है इस आधार पर यह मानना पड़ता है कि राम मंदिर के चोर पहुंचे हुए साहसी कलाकार हैं।

एक लोक प्रिय कहावत भी है “राम जी की चिड़िया, राम जी का खेत; खाओ चिड़िया भर-भर पेट“। जो हमारी नजर में चोर हैं वे शायद चंदे को अपना ही समझ कर खा रहे थे। “अजगर करे न चाकरी, पंछी करे न काम। दास मलूका कह गए, सब के दाता राम॥” कहीं ये राम मंदिर में बैठे अजगर तो नहीं थे।

श्रीरामचरितमानस के रचनाकार संत गोस्वामी तुलसीदास जी ने भी रामचरितमानस में वर्षों पूर्व ही बालकाण्ड में लिख दिया था -“होइ है वही जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा।।” अर्थात् संसार में वही होकर रहेगा जो भगवान श्रीराम ने पहले से तय कर रखा है। व्यर्थ के तर्क – वितर्क करके कौन इसे बढ़ाए। दान के करोड़ों रुपयों और जेवरों का गबन हुआ है। जांच जारी है, कई लोगों से सघन पूछताछ की जा रही है, अनेक लोग गिरफ्तार हुए हैं। संभवतः जांच से सब सामने आ जाए। दूध का दूध पानी का पानी हो जाए। शायद न भी हो क्योंकि “होइहि सोइ जो राम रचि राखा। को करि तर्क बढ़ावै साखा॥” हम तो सिर्फ परिणाम की प्रतीक्षा कर सकते हैं। वैसे यदि चोर राम मंदिर में चोरी करने की जगह कृष्ण मंदिर में चोरी करते तो सफाई में कुतर्क कर सकते थे कि हमने चोर (माखनचोर) के घर चोरी की है, किंतु मर्यादा पुरुषोत्तम के मंदिर में चोरी करके वे बुरी तरह फंस चुके हैं। यों आज के युग में लोग बेशर्मी से चिल्ला – चिल्ला कर चोरी कर रहे हैं, कई लोगों के जीवन यापन का साधन ही फिल्म “चोरी मेरा काम” के हीरो की तरह खुल कर चोरी करना है, ऐसे लोगों पर अब तक क्या प्रतिबंध लगे ? इस फिल्म के गाने के बोल ही देख लीजिये –

चोरी मेरा काम यारो, चोरी मेरा काम।

अरे वो करते हैं चोरी चोरी करून मैं खुले आम।

सुना था स्वतंत्रता पूर्व चोरों – डाकुओं को राजाओं – जमीदारों आदि का संरक्षण प्राप्त रहता था। संरक्षण प्राप्त चोर – डाकू दूसरे राज्यों – क्षेत्रों में चोरी – डकैती करते थे और लूट का धन अपने राज्य राजकोष में जमा करके कमीशन, सुरक्षा व सम्मान प्राप्त करते थे। कहां तक बात करें, दुनिया चोरों से भरी पड़ी है। बहरहाल राम मंदिर के चोरों को राम जी भले ही माफ कर दें लेकिन सरकार और राम भक्त जनता उन्हें कभी माफ नहीं करेगी।

© श्री प्रतुल श्रीवास्तव 

संपर्क – 473, टीचर्स कालोनी, दीक्षितपुरा, जबलपुर – पिन – 482002 मो. 9425153629

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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