श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

(ई-अभिव्यक्ति में श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’ जी का स्वागत। पूर्व शिक्षिका – नेवी चिल्ड्रन स्कूल। वर्तमान में स्वतंत्र लेखन। विधा –  गीत,कविता, लघु कथाएं, कहानी,  संस्मरण,  आलेख, संवाद, नाटक, निबंध आदि। भाषा ज्ञान – हिंदी,अंग्रेजी, संस्कृत। साहित्यिक सेवा हेतु। कई प्रादेशिक एवं राष्ट्रीय स्तर की साहित्यिक एवं सामाजिक संस्थाओं द्वारा अलंकृत / सम्मानित। ई-पत्रिका/ साझा संकलन/विभिन्न अखबारों /पत्रिकाओं में रचनाएँ प्रकाशित। पुस्तक – (1)उमा की काव्यांजली (काव्य संग्रह) (2) उड़ान (लघुकथा संग्रह), आहुति (ई पत्रिका)। शहर समता अखबार प्रयागराज की महिला विचार मंच की मध्य प्रदेश अध्यक्ष। आज प्रस्तुत है आपकी एक विचारणीय लघुकथा – रिश्ते जिंदा है क्या?।)

☆ लघुकथा # १२४ – देशभक्ति का आईना श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

हिंदी दिवस के अवसर पर विद्यालय में देशभक्ति पर भाषण प्रतियोगिता होने वाली थी। शिक्षिका ने बच्चों से पूछा, “बच्चो, बताओ, हमारे स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में तुम क्या जानते हो?”

एक बच्चा सहजता से बोला, “मैडम, आप चिंता मत कीजिए। हम गूगल से भाषण खोजकर याद कर लेंगे। इस बार प्रतियोगिता हम ही जीतेंगे।”

शिक्षिका ने गंभीर होकर पूछा, “बेटा, बात केवल प्रतियोगिता जीतने की नहीं है। क्या तुम जानते हो कि भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद और रानी लक्ष्मीबाई ने देश के लिए क्या किया था?”

बच्चा बोला, “मैडम, इंटरनेट पर सब मिल जाएगा।”

शिक्षिका ने कहा, “इंटरनेट जानकारी दे सकता है, उनके त्याग का एहसास नहीं। राष्ट्रभक्ति केवल भाषण देने का नाम नहीं, उसे जीवन में उतारना भी जरूरी है।”

बच्चा कुछ पल चुप रहा, फिर बोला, “मैडम, जब आज भी शिक्षा व्यवस्था में इतनी समस्याएँ हैं, परीक्षाओं में धांधली होती है और पढ़े-लिखे युवाओं को नौकरी नहीं मिलती, तब हम राष्ट्रभक्ति की बातें क्यों करें?”

शिक्षिका ने कहा, “इसीलिए तो पढ़ो बेटा! राष्ट्रभक्ति केवल ‘भारत माता की जय’ बोलना नहीं है। ईमानदारी से पढ़ना, नकल न करना, गलत के विरुद्ध आवाज उठाना और अपने कर्तव्य को निष्ठा से निभाना भी राष्ट्रभक्ति है।”

बच्चा मुस्कुराया, “तो मैडम, इस बार मैं गूगल से भाषण याद नहीं करूँगा। पहले अपने देश को समझूँगा, फिर देश के लिए कुछ करने की कोशिश करूँगा।”

शिक्षिका की आँखों में संतोष उतर आया।

तभी बच्चा फिर बोला, “लेकिन मैडम, एक बात पूछूँ? अगर मैं सच बोलूँगा, नकल नहीं करूँगा और गलत के खिलाफ आवाज उठाऊँगा… तो क्या अगली बार भी मुझे भाषण प्रतियोगिता में प्रथम आने के लिए गूगल से ही कोई ‘सफलता का मंत्र’ ढूँढ़ना पड़ेगा?”

शिक्षिका निरुत्तर थीं।

कक्षा में सन्नाटा छा गया।

बाहर विद्यालय की दीवार पर बड़े-बड़े अक्षरों में कुछ अच्छा लिखा था।

बच्चे ने उस वाक्य को देखा और धीमे से मुस्कुराया।

शायद उस दिन पहली बार उसने ‘सत्यमेव जयते’ पढ़ा नहीं, बल्कि उसके सामने खड़े होकर देशभक्ति का असली आईना देख लिया था।

© श्रीमति उमा मिश्रा ‘प्रीति’

जबलपुर, मध्य प्रदेश मो. 7000072079

संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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