श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’
☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक सहित्य # ४२९ ☆
संस्मरण – प्रार्थना कक्ष की दीवारे सर्व धर्मी – इंटरनेशनल सिद्धाश्रम शक्ति सेंटर
श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ☆
International Siddhashram Shakti centre
हैरो, लंदन का इंटरनेशनल सिद्धाश्रम शक्ति सेंटर एक स्थान, जिस भवन में आज आरती होती है, मंत्र गूँजते हैं, दीप जलते हैं और भारतीय संस्कृति से जुड़े आयोजन होते हैं, वहाँ कभी Baptist चर्च था, बाद में वह भवन Salvation Army का आराधना स्थल भी रहा। आज यही स्थान सिद्धाश्रम का मंदिर और सामुदायिक केंद्र है।
इस धार्मिक वैभिन्य के इतिहास में कोई धार्मिक टकराव नहीं दिखाई दिया। लगा प्रार्थना कक्ष की दीवारों का धर्म मानवीयता ही होता है। धर्म मनुष्य के मन में होता है, ईंट पत्थर में नहीं।
एक ही छत ने अलग-अलग समय में अलग-अलग आस्था के लोगों की प्रार्थनाएँ सुनीं। भाषा बदली, पूजा की विधि बदली, आस्था की अभिव्यक्ति बदली, लेकिन प्रार्थना में उस अदृश्य परम शक्ति से तादात्म्य स्थापित करने की मनुष्य की वही तलाश बनी रही।
यही बात भारत के संदर्भ में भी सोचने को विवश करती है। हम कभी-कभी धर्मस्थलों की दीवारों के नीचे दबे इतिहास को खोजते-खोजते वर्तमान की शांति से बहुत दूर निकल जाते हैं। कौन-सा भवन पहले क्या था, किसका था और किसने क्या बनाया, ये प्रश्न इतिहास के लिए महत्वपूर्ण हो सकते हैं, लेकिन क्या उन्हें वर्तमान के वैमनस्य का कारण बनना चाहिए? हमें इन्हें अदालतों में हल करना पड़ रहा है!
लंदन में यह भवन उसी तरह के इतिहास का एक शांत उत्तर देता दिखाई देता है। किसी ने अतीत को मिटाकर वर्तमान नहीं बनाया , वर्तमान ने अतीत को अपने भीतर समेट लिया।
लंदन की बहुधार्मिक समभावी संस्कृति का यह पक्ष मुझे विशेष रूप से आत्मीय लगा। अपनी आस्था को पूरी श्रद्धा से जीना और दूसरे की आस्था के लिए भी स्थान छोड़ना।
सिद्धाश्रम की गतिविधियाँ भी पूजा तक सीमित नहीं, समुदाय और मानवता की सेवा से जुड़ी हुई हैं।
हमारे यहाँ भी तो प्रार्थना का मूल भाव है, सर्वे भवन्तु सुखिनः। फिर धर्म की आत्मा से अधिक उसकी जमीन, दीवार और इतिहास के स्वामित्व को लेकर, प्रतिक्रिया में लोग इतने बेचैन क्यों हो जाते हैं?
जिस स्थान पर आज कोई आरती कर रहा है, वहाँ कल किसी और ने प्रार्थना की थी, तो क्या ईश्वर कल वहाँ कम थे और आज अधिक हैं? शायद नहीं।
ईश्वर नहीं , केवल भक्तों के उन्हें पूजने के रास्ते बदलते है।
सिद्धाश्रम के इस भवन के इतिहास ने यही छोटी-सी, लेकिन गहरी बात सिखाई। आस्था को मन में रखिए, इतिहास को इतिहास में और वर्तमान को प्रेम से जीना ही पूजा है। इसी को सह-अस्तित्व कहते हैं।
22 Palmerston Road, मंदिर से लौटते हुए लगा कि इस भवन में आज दैदीप्य भारतीय संस्कृति का दीप केवल सनातन आस्था का दीप नहीं है। वह उन तमाम प्रार्थनाओं की निरंतरता का दीप है, जिन्हें इन दीवारों ने वर्षों से अपने भीतर सँजोया है।
मंदिर-मस्जिद-गिरजे बदलते रहते हैं,
प्रार्थना करने वाला मन वही रहता है।
इस इतिहास को समझने के उपरांत हैरो , लंदन के इंटरनेशनल सिद्धाश्रम शक्ति सेंटर में 5 सितंबर की शाम कवि सम्मेलन में हिस्सा लेने के बाद लौटते हुए वह शाम मेरे लिए लंदन में इतिहास, आस्था और सह-अस्तित्व को एक ही छत के नीचे देखने की शाम थी।
फिर मिलूँगा, लंदन की किसी ऐसी ही कहानी के साथ, जिसे सबने देखा है, पर शायद अनदेखा कर दिया है।
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© श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव
समीक्षक, लेखक, व्यंगयकार
लंदन प्रवास पर
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≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈







