✍ लेखनी सुमित्र की – स्मृतिशेष डॉ गायत्री तिवारी विशेष – ओ प्राणमयी… ✍

स्व. डॉ. राजकुमार तिवारी “सुमित्र”

(संस्कारधानी  जबलपुर के हमारी वरिष्ठतम पीढ़ी के साहित्यकार गुरुवर डॉ. राजकुमार “सुमित्र” जी  को सादर चरण स्पर्श । वे सदैव हमारी उंगलियां थामकर अपने अनुभव की विरासत हमसे समय-समय पर साझा करते रहते थे। इस पीढ़ी ने अपना सारा जीवन साहित्य सेवा में अर्पित कर दिया।  वे निश्चित ही हमारे आदर्श हैं और प्रेरणास्रोत हैं। आज प्रस्तुत हैं  स्मृतिशेष डॉ गायत्री तिवारी जी  की स्मृति में आपकी कविता – ओ प्राणमयी।)

✍ लेखनी सुमित्र की – स्मृतिशेष डॉ गायत्री तिवारी विशेष – ओ प्राणमयी… ✍

ओ प्राणमयी, ओ दीप्तिमयी

जीवन संगिनि मेरी ।

 *

लाया था मैं तुम्हें व्याहकर

हुआ यही अनहोना

दुनिया मिली अभावों वाली

दे न सका सुख दौना।

सोचा दूँगा पूरनमासी

सौंपी रात अँधेरी ।

 *

कब रेशम श्रृंगार किया था

कब आभूषण पहने

मेरी लाज बचाने खातिर

उतर गये सब गहने

रानी रानी कहा किया पर

बना दिया था चेरी

 *

उजड़ी उजड़ी सी बगिया में

तुमने फूल खिलाये

पथराये प्राणों में तुमने

नये बीज अँकुराये

बिना कहे ही समझी तुमने

मेरी पीर घनेरी

*

मेरी मान प्रतिष्ठा को ही

जीवन लक्ष्य बनाया

मेरी हर इच्छा को तुमने

शिशु जैसा दुलराया

मन की बात जान लेती हो

लगती नहीं अबेरी

*

अर्पित किया सभी कुछ तुमने

बदले में क्या पाया

जीवन के दु:खों  को तुमने

सदा गीत सा गाया।

कल्पवृक्ष सी बनी रहीं तुम

मैं जैसे झरबेरी ।

 

© डॉ. राजकुमार “सुमित्र” 

साभार : डॉ भावना शुक्ल 

112 सर्राफा वार्ड, सिटी कोतवाली के पीछे चुन्नीलाल का बाड़ा, जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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