श्रीमती शशि सराफ

(श्रीमती शशि सुरेश सराफ जी सागर विश्वविद्यालय से हिंदी एवं दर्शन शास्त्र से स्नातक हैं. आपने लायंस क्लब और स्वर्णकार समाज की अध्यक्षा पद का भी निर्वहन किया. आपका “लेबल शशि” नाम से बुटीक है और कई फैशन शोज में पुरस्कार प्राप्त किये हैं. आपका साहित्य और दर्शन से अत्यधिक लगाव है. आप प्रत्येक शुक्रवार श्रीमती शशि सराफ जी की रचनाएँ आत्मसात कर सेंगे. आज प्रस्तुत है आपकी एक भावप्रवण कविता ‘देर क्या…‘।)

☆ शशि साहित्य # ३९ ☆

? कविता – देर क्या…  ☆ श्रीमती शशि सुरेश सराफ  ? ?

☆

रात ने जब मन बना लिया जाने का…

फिर भोर होने में अब देर क्या l

*

कली ने खिलकर गुलाब होना तय किया…

तो कांटों को जगह देने में देर क्या l

*

सुघड़ हाथ है, माटी भी है तैयार…

रूप सजीला ढ़लने में, अब फिर देर क्या l

*

पुष्पित हो गए वह फूल, जो कली बने थे कल,

एक डोर गूंथकर, जयमाल बनने में देर क्या l

*

देख हौसला जलते दिए का, जो लड़ने मरने हो तैयार…

फिर भला तूफान को लौट जाने में देर क्या l

*

सपना है ना तू मेरा, ना कोई मेरा अपना…

फिर पलकों पर सजाने के बजाय ढलका देने में देर क्या l

*

शब्द शब्द में प्रीत है, शब्द ही बन गए बाण,

दग्ध करे जो खंजर जैसे, उनको मिटा देने में देर क्या l

*

आशा है और विश्वास है परमेश्वर का है ध्यान…

ठान लिया जब लक्ष्य है पाना, कदम बढ़ाने में फिर देर क्या l

☆

© श्रीमती शशि सराफ

जबलपुर, मध्यप्रदेश 

≈ संस्थापक संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈

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