श्रीमती सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य शृंखला में आज प्रस्तुत है नवरात्र पर्व पर विशेष कविता “श्री राम बसे निर्मल मन में”।)
☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य # २८१ ☆
🌻कविता🌻 श्री राम बसे निर्मल मन में 🚩☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ ☆
☆
श्री राम बसे निर्मल मन में, कितना पावन ये तन है।
रोम – रोम आनंदित पल – पल, नाच उठा सुंदर मन है।।
*
मेरी दृष्टि निहारे अपलक, राम लला रघुनंदन है।
जीवन मैं करती न्योछावर, चरण – धूलि नित चंदन है।
मर्यादा पुरुषोत्तम राघव, भक्तों के अभिनंदन है।
श्री राम बसे निर्मल मन में, कितना पावन ये तन है।।
*
संस्कारों के परम पुजारी , भार्या जनक दुलारी है।
कौशल्या दशरथ के नंदन, तुम पर दुनिया वारी है।
दीप जला मैं करूँ आराधन, सुबह शाम नित वंदन है।
श्री राम बसे निर्मल मन में, कितना पावन ये तन है।।
*
जन्म – मरण के सारे बंधन, राम जपे कट जाते हैं।
तार अहिल्या बाली मारे , हनुमत जी के प्यारे हैं।
शबरी केवट अरु जटायु , भक्त जनों के कंचन हैं।
श्री राम बसे निर्मल मन में, कितना पावन ये तन है।।
*
दास विभीषण के शुभचिंतक, रावण को संघारे हैं।
वैदेही की अग्नि परीक्षा, लेकर के प्रभु हारे हैं।
अंत दशानन कहते बातें, राम रतन जीवन धन हैं।
श्री राम बसे निर्मल मन में, कितना पावन ये तन है।।
*
राम भजे हित दास तुम्हारा, राम ही प्राण प्यारे हैं।
पावन है जननी माँ सीता, हृदय राम को धारे हैं।
तुलसीदास लिखे रामायण, सबका ये मनभावन है।
श्री राम बसे निर्मल मन में, कितना पावन ये तन है।।
☆
© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’
≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ ≈





