डॉ कुंवर प्रेमिल

(डॉ कुंवर प्रेमिल जी  जी को  विगत 50 वर्षों  से लघुकथा, कहानी, व्यंग्य में लगातार लेखन का अनुभव हैं। अब तक दस पुस्तकें प्रकाशित। 2009 से प्रतिनिधि लघुकथाएं (वार्षिक) का सम्पादन एवं ककुभ पत्रिका का प्रकाशन और सम्पादन। वरिष्ठतम नागरिकों ने उम्र के इस पड़ाव पर आने तक कई महामारियों से स्वयं की पीढ़ी  एवं आने वाली पीढ़ियों को बचाकर वर्तमान तक का लम्बा सफर तय किया है। आज प्रस्तुत है  उनकी एक अतिसुन्दर  एवं सार्थक लघुकथा “ लाठी ”। )

☆ लघुकथा – लाठी ☆  

“यह किसकी लाठी है?”

“मेरे दादाजी की  है जी.”

“और यह लाठी ?”

“दादाजी के दादाजी की है जी. ”

“और उस कोने में  रखी वह लाठी?”

“दादा जी के दादाजी के दादाजी की है जी.”

“अजीब देश है तुम्हारा जी, जहां देखो जिसके हाथ में देखो, लाठी मिलेगी. बिना लाठी यहां के लोग चल नहीं सकते है क्या? ”

“ठीक कहा है जी आपने, इन सभी लाठियों के ऊपर है गांधी बाबा की लाठी.”

“वही पुरानी सी पतली सी लाठी!”

“हां वही पुरानी पतली सी लाठी, जिसने अंग्रेजों की कमर तोड़ दी थी…… अरे एक युग हांक दिया था उस लाठी ने जी. ”

“वह तो मैंने अखबारों में पढ़ा था. लाठियों की  पीढ़ियां देखने मिल गई. कभी कुछ लिखने लायक हुआ तो लाठियों पर पी.एच.डी. जरूर करूंगा. काश! गांधी बाबा हमारे देश में पैदा हुए होते, मेरे ऊपर एक कृपा करना, देश लौटते समय एक लाठी मुझे भी भेंट कर देना.”

एक विदेशी पर्यटक इस देश का मेहमान बना था. जाते समय वह एक लाठी लेकर अपने देश चला गया.

 

© डॉ कुँवर प्रेमिल
एम आई जी -8, विजय नगर, जबलपुर – 482 002 मोबाइल 9301822782

Please share your Post !

Shares
0 0 votes
Article Rating
Subscribe
Notify of
guest

1 Comment
Oldest
Newest Most Voted
Inline Feedbacks
View all comments
Shyam Khaparde
0

अच्छी रचना