डॉ कामना तिवारी श्रीवास्तव

(आज  प्रस्तुत है  डॉ कामना तिवारी श्रीवास्तव जी  की एक विचारणीय लघुकथा  बेघर।  

☆ लघुकथा – बेघर ☆

“पिताजी मेरा नाम क्यों नहीं लिखवाया?”

नन्ही सी नम्रता ने अपने नए घर की नेम प्लेट पर पिता और छोटे भाई का नाम लिखा देखकर पूछा।

“बेटियां तो पराई होती हैं तुम्हारा घर तो तुम्हारे पति का घर होगा” पिताजी ने कहा

बेटियां पराई होती हैं, जिम्मेदारी होती हैं सुनते सुनते नम्रता 18 साल में ही ब्याह दी गई। ससुराल आकर  लगातार एक पैर पर  चकरघिन्नी जैसे घूमते घूमते सास-ससुर की सेवा और बच्चों को पालने में लग गई।   साथ साथ अपना घर… और घर पर लिखा अपना नाम के सपनों को जीती हुई उसे पूरा करने में जुट गई।  पति की कम आय में गुजारा करना शुरू के दिया।

कामवाली भी नहीं लगवाई और बच्चों को ट्यूशन खुद ही सब निपटा लेती। फिर स्कूल में नौकरी और शाम को ट्यूशन के साथ आखिरकार लोन लेकर घर बनवाया।

बरसो के अथक प्रयासों के बाद नेमप्लेट पर केवल पति का और बेटे का नाम लिखा देख बचपन से पाला हुआ अरमान एक पल में ही धराशाई हो गया।

 

© डॉ कामना तिवारी श्रीवास्तव

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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