श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’ 

(हम प्रतिष्ठित साहित्यकार श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’जी के आभारी हैं जिन्होने  साप्ताहिक स्तम्भ – “विवेक की पुस्तक चर्चा”शीर्षक से यह स्तम्भ लिखने का आग्रह स्वीकारा। श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र जी, अतिरिक्त मुख्यअभियंता सिविल (म प्र पूर्व क्षेत्र विद्युत् वितरण कंपनी, जबलपुर ) में कार्यरत हैं। तकनीकी पृष्ठभूमि के साथ ही उन्हें साहित्यिक अभिरुचि विरासत में मिली है।  उनका कार्यालय, जीवन एवं साहित्य में अद्भुत सामंजस्य अनुकरणीय है। इस स्तम्भ के अंतर्गत हम उनके द्वारा की गई पुस्तक समीक्षाएं/पुस्तक चर्चा आप तक पहुंचाने का प्रयास  करते हैं । आप प्रत्येक मंगलवार को श्री विवेक जी के द्वारा लिखी गई पुस्तक समीक्षाएं पढ़  सकते हैं ।

आज प्रस्तुत है श्री आशीष दशोत्तर जी  के  व्यंग्य  संग्रह   “मोरे अवगुन चित में धरो” पर श्री विवेक जी की पुस्तक चर्चा। )

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – विवेक की पुस्तक चर्चा – # 46 ☆ 
पुस्तक चर्चा

पुस्तक – व्यंग्य संग्रह – मोरे अवगुन चित में धरो

व्यंग्यकार – श्री आशीष दशोत्तर

प्रकाशक – बोधि प्रकाशन,

पृष्ठ – १८४

मूल्य – २०० रु

☆ पुस्तक चर्चा – व्यंग्य  संग्रह  – मोरे अवगुन चित में धरो – व्यंग्यकार –श्री आशीष दशोत्तर ☆ समीक्षक -श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र☆

श्री आषीश दशोत्तर व्यंग्य के सशक्त समकालीन हस्ताक्षर के रूप में प्रतिष्ठा प्राप्त कर चुके हैं. वे विज्ञान,  हिन्दी, शिक्षा,  कानून में उपाधियां प्राप्त हैं. साहित्य अकादमी सहित कई संस्थाओ ने उनकी साहित्यिक प्रतिभा को पहचान कर उन्हें सम्मानित भी किया है. परिचय की इस छोटी सी पूर्व भूमिका का अर्थ गहरा है. आषीश जी के लेखन के विषयो की व्यापकता और वर्णन की विविधता भरी उनकी शैली में उनकी शिक्षा का अपरोक्ष प्रभाव दृष्टिगोचर होता है. किताब की भूमिका सुप्रसिद्ध व्यंग्यकार प्रेम जनमेजय ने लिखी है,  वे लिखते हैं ” आषीश दशोत्तर के लेखन में असीम संभावनायें है,  उनके पास व्यंग्य की दृष्टि है और उसके उचित प्रयोग का संयम भी है. ” मैने इस किताब के जो  कुछ व्यंग्य पढ़े हैं और जितना इस चर्चा से पहले से यत्र तत्र उन्हें पढ़ता रहा हूं उस आधार पर मेरा दृष्टिकोण भूमिका से पूरी तरह मेल खाता है. व्यंग्य तभी उपजता है जब अवगुन चित में धरे जाते हैं. दरअसल अवगुणो के परिमार्जन के लिये रचे गये व्यंग्य को समझकर अवगुणो का परिष्कार हो तो ही व्यंग्य का ध्येय पूरा होता है. यही आदर्श स्थिति है.  इन दिनो व्यंग्य की किताबें और उपन्यास,  किसी जमाने के जासूसी उपन्यासो सी लोकप्रियता तो प्राप्त कर रही हैं पर गंभीरता से नही ली जा रही हैं. हमारे जैसे व्यंग्यकार इस आशा में अवगुणो पर प्रहार किये जा रहे हैं कि हमारा लेखन कभी तो महज पुरस्कार से ऊपर कुछ शाश्वत सकारात्मक परिवर्तन ला सकेगा. आषीश जी की कलम को इसी यात्रा में सहगामी पाता हूँ.

किताब के पहले ही व्यंग्य पेड़ पौधे की अंतरंग वार्ता में वे लिखते हैं “पेड़ की आत्मा बोली अच्छा तुम्हें जमीन में रोप भी दिया गया तो इसकी क्या गारंटी है कि तुम जीवित रहोगे ही “. .. पेड़ की आत्मा पौधे को बेस्ट आफ लक बोलकर जाने लगी तो पौधा सोच रहा था उसे कोई न ही रोपे तो अच्छा है. ऐसी रोचक नवाचारी बातचीत  विज्ञान वेत्ता के मन की ही उपज हो सकती थी.

पुराने प्रतीको को नये बिम्बों में ढ़ालकर,  मुहावरो और कथानको में गूंथकर मजेदार तिलिस्म उपस्थित करते आषीश जी पराजय के निहितार्थ में लिखते है ” कछुये को आगे कर खरगोश ने राजनीति पर नियंत्रण कर लिया है,  कछुआ जहां था वहीं है,  वह वही कहता और करता है जो खरगोश चाहता है ” वर्तमान कठपुतली राजनीति पर उनका यह आब्जरवेशन अद्भुत है. जिसकी सिमली पाठक कई तरह से ढ़ूंढ़ सकता है. हर पार्टी के  हाई कमान नेताओ को कछुआ बनाये हुये हैं,  महिला सरपंचो को उनके पति कछुआ बनाये हुये हैं,  रिजर्व सीटों पर पुराने रजवाड़े और गुटो की खेमाबंदी हम सब से छिपी नही है,  पर इस शैली में इतना महीन कटाक्ष दशोत्तर जी ही करते दिखे.

शब्द बाणों से भरे हुये चालीस ताकतवर तरकश लिये यह एक बेहतरीन संग्रह है जिसे मैं खरीदकर पढ़ने में नही सकुचाउंगा. आप को भी इसे पढ़ने की सलाह है.

समीक्षक .. विवेक रंजन श्रीवास्तव

ए १, शिला कुंज, नयागांव, जबलपुर ४८२००८

मो ७०००३७५७९८

 ब्लॉग संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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हनुमान मुक्त
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बहुत सुंदर सर
अच्छी समीक्षा की है।
शुभकामनाएं