श्री संजय भारद्वाज
(श्री संजय भारद्वाज जी – एक गंभीर व्यक्तित्व । जितना गहन अध्ययन उतना ही गंभीर लेखन। शब्दशिल्प इतना अद्भुत कि उनका पठन ही शब्दों – वाक्यों का आत्मसात हो जाना है।साहित्य उतना ही गंभीर है जितना उनका चिंतन और उतना ही उनका स्वभाव। संभवतः ये सभी शब्द आपस में संयोग रखते हैं और जीवन के अनुभव हमारे व्यक्तित्व पर अमिट छाप छोड़ जाते हैं। हम आपको प्रति रविवार उनके साप्ताहिक स्तम्भ – संजय उवाच शीर्षक के अंतर्गत उनकी चुनिन्दा रचनाएँ आप तक पहुँचा रहे हैं। सप्ताह के अन्य दिवसों पर आप उनके मनन चिंतन को संजय दृष्टि के अंतर्गत पढ़ सकते हैं। )
☆ संजय दृष्टि – लघुकथा – मोर्चा ☆
आज फिर एक घटना घटी थी। आज फिर वह उद्वेलित हुआ था। घटना के विरोध में आयोजित होने वाले मोर्चों, चर्चाओं, प्रदर्शनों में शामिल होने के लिए हमेशा की तरह वह आज भी तैयार था। कल के मोर्चा, प्रदर्शन की योजना बनी। हर प्रदर्शन में उसकी भूमिका बड़ी महत्वपूर्ण होती। उसके दिये नारे मोर्चों की जान थे। रोड मैप बनाने में सुबह से शाम हो गई। वह थककर चूर हो गया।
सारी तैयारी कर बिस्तर पर लेटा। आँखों में मोर्चा ही था। बड़ी देर लगी नींद को अपनी जगह बनाने में। फिर स्वप्न में भी मोर्चा ही आ डटा। वह नारे उछालने लगा। भीड़ उसके नारे दोहराने लगी। नारों की गति बढ़ने लगी। एकाएक मानो दिव्य प्रकाश फूटा। अलौकिक दृष्टि मिली। इस दृष्टि में भीड़ के चेहरे धुंधले होने लगे। इस दृष्टि में मोर्चे के आयोजकों के पीछे खड़ी आकृतियाँ धीरे-धीरे उभरने लगीं। लाइव चर्चाओं से साधी जाने वाली रणनीति समझ में आने लगी। प्रदर्शनों के पीछे की महत्वाकांक्षाएँ पढ़ी जा सकने लगी। घटना को बाजार बनाने वाली ताकतों और घटना के कंधे पर सवार होकर ऊँची छलांग लगाने की हसरतों के चेहरे साफ-साफ दिखने लगे। इन सबकी परिणति में मृत्यु, विकलांगता, जगह खाली कराना, पुरानी रंजिशों के निबटारे और अगली घटना को जन्म दे सकने का रॉ मटेरिअल सब, स्लाइड शो की तरह चलने लगा। स्वप्न से निकलकर वह जागृति में आ पहुँचा।
सुबह उसके घर पर ताला देखकर मोर्चे के आयोजक मायूस हुए।
उधर वह चुपचाप पहुँचा पीड़ित के घर। वहाँ सन्नाटा पसरा था। नारे लगाती भीड़ की आवाज़ में एक कंधे का सहारा पाकर परिवार का बुजुर्ग फफक-फफक कर रो पड़ा।
© संजय भारद्वाज
☆ अध्यक्ष– हिंदी आंदोलन परिवार ☆ सदस्य– हिंदी अध्ययन मंडल, पुणे विश्वविद्यालय ☆ संपादक– हम लोग ☆ पूर्व सदस्य– महाराष्ट्र राज्य हिंदी साहित्य अकादमी ☆ ट्रस्टी- जाणीव, ए होम फॉर सीनियर सिटिजन्स ☆
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सच है, मोर्चों,प्रदर्शनों में जान माल का खतरा, विकलांगता आदि अकसर होती हैं, इनसे कुछ हल नहीं निकलता सिवाय इसके कि गलत लोगों को प्रश्रय मिलता है।अतः इन पर रोक लगनी चाहिए।
“मोर्चा ” लघुकथा आरंभ से अंत तक एक चलचित्र की तरह चलती रही , अमिट छाप छोड़ गई -अंत अत्यंत मार्मिक है – क्या मिलता है किसीको ? दर्द , तबाही और क्या ? …….