श्री शांतिलाल जैन

(आदरणीय अग्रज एवं वरिष्ठ व्यंग्यकार श्री शांतिलाल जैन जी विगत दो  दशक से भी अधिक समय से व्यंग्य विधा के सशक्त हस्ताक्षर हैं। आपकी पुस्तक  ‘न जाना इस देश’ को साहित्य अकादमी के राजेंद्र अनुरागी पुरस्कार से नवाजा गया है। इसके अतिरिक्त आप कई ख्यातिनाम पुरस्कारों से अलंकृत किए गए हैं। इनमें हरिकृष्ण तेलंग स्मृति सम्मान एवं डॉ ज्ञान चतुर्वेदी पुरस्कार प्रमुख हैं। श्री शांतिलाल जैन जी  के  साप्ताहिक स्तम्भ – शेष कुशल  में आज प्रस्तुत है उनका एक अतिसुन्दर व्यंग्य  “लक्ष्मी नहीं, बेटी ही आई है…” । इस साप्ताहिक स्तम्भ के माध्यम से हम आपसे उनके सर्वोत्कृष्ट व्यंग्य साझा करने का प्रयास करते रहते हैं । व्यंग्य में वर्णित सारी घटनाएं और सभी पात्र काल्पनिक हैं ।यदि किसी व्यक्ति या घटना से इसकी समानता होती है, तो उसे मात्र एक संयोग कहा जाएगा। हमारा विनम्र अनुरोध है कि  प्रत्येक व्यंग्य  को हिंदी साहित्य की व्यंग्य विधा की गंभीरता को समझते हुए सकारात्मक दृष्टिकोण से आत्मसात करें। ) 

☆ साप्ताहिक स्तम्भ – शेष कुशल # 24 ☆

☆ व्यंग्य – लक्ष्मी नहीं, बेटी ही आई है ☆ 

“बधाई हो, आपके घर लक्ष्मी आई है.”

एक बारगी तो मैं घबरा ही गया, बिटिया के न चार हाथ, न ऊपर के दो हाथों में कमल, न तीसरे से ढुलती गिन्नियों का घड़ा है, न आशीर्वाद की मुद्रा में एक हथेली ही है. एक अबोध प्यारी गुलाबी बिटिया है, धरती पर साफ कोरी स्लेट की मानिंद. उस पर कोई देवी होने की ईबारत क्यों लिखे. असमंजस में रहा, धन्यवाद दूँ कि नहीं दूँ. बेटी चाही थी, बेटी मिली भी, अभी तो इसी से सातवें आसमान पर हूँ. उस पर कोई लक्ष्मी होना निरूपित न करे तो भी आसानी से जमीन पर उतरनेवाला नहीं हूँ. उन्हें लगा होगा कि बेटी के जन्म से अपन प्रसन्न नहीं हैं, वे लक्ष्मीजी के आने की प्रत्याशा जगाकर अपन का दुःख कम कर देंगे. उनके इस भोलेपन पर तरस आता है. उन्हें लगता है लक्ष्मी आने की सूचना मात्र से अपन झूमने लगेंगे, तो सिरिमान अपन तो सिम्पल बिटिया के आने की खुशी में वैसेई झूम रहे हैं. थोड़ी भौत जित्ती पॉकेट में धरी थी उसे नर्सों वार्ड-ब्वायों में बाँट चुके हैं. थोड़ी लक्ष्मी बैंक अकाउंट में धरी है सो भी कुछ देर में अस्पताल के अकाउंट के लिए प्रस्थान करने वाली है. अस्पतालवालों ने थोड़ी मेहर न की तो ‘पूप-सी’ की बोतल खरीदने लायक भी ना बचेगी. यूं भी लक्ष्मीजी का अपन से आंकड़ा छत्तीस का रहा है. नॉर्मली वे बायपास से गुजर जातीं हैं अपन के कूचे में झाँकती भी नहीं. और फिर, बेटे की प्रत्याशा में जिनकी गोद में पाँच-छह लक्ष्मियाँ आ जाती हैं वे तो मुकेश अंबानी से आगे निकल जाते होंगे.

फोन पर बधाई देनेवाले मित्र ने संतान में लक्ष्मी कभी नहीं चाही. लक्ष्मीजी लक्ष्मीजी की तरह ही आयें संतान का रूप धरकर नहीं सो अतिरिक्त सावधानी बरतते रहे. रिजल्ट आने तक आदरणीया भाभीजी को ‘पुत्र जीवक वटी’ भी खिलाते रहे, ओटलों-मज़ारों-साक्षात स्थानों पर मन्नत भी मांगते रहे॰ कुछ दिनों पहले उन्होने बिन मांगे सलाह दी ही थी – टेंशन मत लेना सांतिभिया इस बार न भी तो अगली बार प्लान करके करना, लड़का ग्यारन्टीड. महोबावाली मौसी की दवा के रिजल्ट हंड्रेड परसेंट हैं. थोड़ी देर और बात करते तो वे फॉयटिसाइड व्हाया अल्ट्रा-साउंड पर उतर आते. वे उन लोगों में से हैं जो लक्ष्मी के थोड़ा बड़ा होते ही स्कूल छुड़वाकर कर झाड़ू हाथ में थमा देने में यकीन रखते हैं. दरअसल वे विषय को लक्ष्मीजी के उस वाहन की तरह बरत रहे थे जिसे रात में ही दिखाई देता है. उन्हें बेटी गोरी और लक्ष्मी काली पसंद है. उन्होने बेतुकी तुक मिलाई – “सांतिभिया, पहली बेटी धन की पेटी होती है.”

मैंने कहा – “बेटी के आने से जो भावनात्मक और पारिवारिक समृद्धि हुई है वो धन सम्पदा से कहीं ज्यादा है माय डियर. एनी-वे थैंक-यू.” कट.

सारा संवाद दादू सुन रहा था, बोला – “इसे सीरियसली मत लो सांतिभिया, ये तो मुहावरे भर हैं.”

“मुहावरे ‘सरस्वती आई है’ जैसे भी तो गढ़े जा सकते थे.”

“सरस्वती साधन है लक्ष्मी साध्य है. लक्ष्मीजी की पूजा भारत मंं होती है मगर वे विराजती न्यूयॉर्क में हैं. तभी तो सवा दो साल के बच्चे को भी लोग प्रि-प्रीपेरेटोरी स्कूल में भर्ती करा आते हैं. सपना डेस्टिनेशन यूएसए का. नौकरी लगते ही सरस्वती पूजन का दौर समाप्त. लक्ष्मीजी की चाहत में जिंदगी गुजार दी तो मुहावरा तो उन्ही का गढ़ा जाएगा ना. कभी किसी सरकार को लाड़ली सरस्वती योजना की शुरुआत करते पाया है?”

“बात तो तब बने जब लड़का हो और कोई कहे – बधाई हो राम, कृष्ण या महावीर आये हैं. लक्ष्मी की कामना सब करते हैं दादू – संतान में नहीं, खीसे में.”

इस बीच एक वाट्सअप मैसेज मिला – ‘कांग्रेट्स, मुलगी झाली – लक्ष्मी आली.’ भांग तो पूरे कुएं में घुली है, नी क्या?

© शांतिलाल जैन 

बी-8/12, महानंदा नगर, उज्जैन (म.प्र.) – 456010

9425019837 (M)

 संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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Shyam Khaparde

बेहतरीन व्यंग बधाई