श्रीमती  सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

(संस्कारधानी जबलपुर की श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’ जी की लघुकथाओं, कविता /गीत का अपना संसार है। साप्ताहिक स्तम्भ – श्रीमति सिद्धेश्वरी जी का साहित्य  शृंखला में आज प्रस्तुत है यथार्थ के धरातल पर स्त्री विमर्श पर आधारित एक अत्यंत संवेदनशील एवं विचारणीय लघुकथा दो बाँस”। ) 

☆ श्रीमति सिद्धेश्वरी जी  का साहित्य # 126 ☆

☆ लघुकथा – दो बाँस 

कमलाबाई गाँव में अपने पति झुमुक लाल के साथ रहती थी। निसंतान होने के कारण सारी जमीन जायदाद उसके छोटे भाई ने अपने नाम लिखवा लिया। खाने के लाले पड़ने लगे, उम्र ज्यादा होने के कारण झुमुक लाल को दिखाई नहीं देता था। आँखों से लाचार फिर भी पत्नी के लिए परेशान रहता था।

किसी तरह खाने-पीने का इंतजाम हो जाता था। आस पड़ोस के लोग कुछ सहायता कर जाते हैं और थोड़ा बहुत अनाज दे जाते थे। एक छोटे से झोपड़ी नुमा घर में रहते थे।

चुनाव चल रहा था। वोट मांगने प्रत्याशी घर-घर दस्तक दे रहे थे। कमलाबाई के घर आने पर पूछा गया…” सब ठीक-ठाक है।” कमलाबाई ने हाथ जोड़कर कहा…. “जैसे तैसे खाने का इंतजाम हो जाता है साहेब, परंतु झोपड़ी में एक तरफ से पानी आएगा अब बरसात भी आने वाली है, आप मुझे दो बड़े बड़े बाँस दिलवा देते तो मैं पन्नी लगाकर घर को बचा लेती।”

मंत्री जी ने बड़े बड़े अक्षरों पर लिखवा लिया कि बाँस दिया जाए। कमला और झुमुक लाल खुश थे कि बाँस मिल जाएगा और घर की टपरिया में पन्नी बांध लेंगे।

वोट देते समय कमलाबाई खुश थीं। अब घर बन जाएगा।

अचानक रात में तेज बारिश और आंधी चली। पति-पत्नी एक कोने का सहारा लिए बैठे थे। सुबह-सुबह एक तरफ से दिवाल गिरी और झुमुक लाल बैठे का बैठा ही रह गया।

प्राण पखेरू उड़ चुके थे। मंत्री महोदय के घर से दो बाँस आ गया कोरे कागज पर कमला का अंगूठा लगाया गया बांस मिल गया।

कितने दयावान है मंत्री जी अंतिम संस्कार के लिए नया बाँस और कुछ रूपया कमलाबाई को दिए हैं।

तस्वीर खींचते देर नहीं लगी। शाम को कमलाबाई को एक बड़ी गाड़ी लेने आई और एक बाँसो से भरी ट्राली भी आई।

कमलाबाई को अनाथ आश्रम के लिए भेजा गया और उस झोपड़ी के चारों तरफ बाँस  की बल्लियां लगाई गई।

कमलाबाई शून्य हो ताकतीं रहीं। झोपड़ी नुमा मकान में चारों तरफ से बल्लियां लगाकर मंत्री जी के नाम की तख्ती लग गई।

© श्रीमति सिद्धेश्वरी सराफ ‘शीलू’

जबलपुर, मध्य प्रदेश

≈ संपादक – श्री हेमन्त बावनकर/सम्पादक मंडल (हिन्दी) – श्री विवेक रंजन श्रीवास्तव ‘विनम्र’/श्री जय प्रकाश पाण्डेय  ≈

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